सोमवार, 22 दिसंबर 2025

बेवजह

बेवजह आधी रात नींद ,टूट जाती है।
बेवजह मेरे बारे में, कोई सोच रहा है।

मनोज

शनिवार, 6 दिसंबर 2025

हे प्रभु

बदलाव जरूरी है पर इतना।
हे प्रभु, स्वप्न इससे अच्छा था।।

गुरुवार, 6 नवंबर 2025

ऊषा गांगुली : भारतीय रंगमंच की मर्मज्ञ साधिका

ऊषा गांगुली : भारतीय रंगमंच की मर्मज्ञ साधिका

ऊषा गांगुली : हिंदी रंगमंच की नारी दृष्टि और यथार्थ का आत्मसंघर्ष

भारतीय रंगमंच के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो न केवल अपनी प्रतिभा से, बल्कि अपनी वैचारिक दृष्टि और सामाजिक प्रतिबद्धता से भी अमिट छाप छोड़ जाते हैं। ऊषा गांगुली उन्हीं विशिष्ट व्यक्तित्वों में से एक थीं। वे एक ऐसी नाट्यकर्मी थीं जिन्होंने हिंदी रंगमंच को बंगाल की धरती पर प्रतिष्ठित किया, और सामाजिक यथार्थ को मंच पर जीवंत कर दिखाया। अभिनेत्री, निर्देशक, शिक्षिका और सामाजिक कार्यकर्ता — ऊषा गांगुली का जीवन रंगमंच की निरंतर साधना का पर्याय था।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

ऊषा गांगुली का जन्म 20 जनवरी 1945 को कोलकाता में हुआ था। साहित्य और नाट्यकला के प्रति उनकी रुचि बचपन से ही थी, किंतु उस समय किसी को यह आभास भी नहीं था कि वे एक दिन भारतीय रंगमंच की दिशा ही बदल देंगी। शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने अध्यापन को अपने पेशे के रूप में चुना। अध्यापन के साथ-साथ वे रंगमंच से भी जुड़ी रहीं, और यही जुड़ाव धीरे-धीरे उनके जीवन का केंद्र बन गया।

सत्तर के दशक में ऊषा गांगुली ने रंगमंच की दुनिया में कदम रखा। प्रारंभिक दौर में उन्होंने विभिन्न बंगाली नाट्य संस्थाओं के साथ काम किया, परंतु शीघ्र ही उन्हें यह महसूस हुआ कि हिंदी रंगमंच के लिए बंगाल में पर्याप्त मंच नहीं हैं। इसी सोच ने उन्हें 1976 में अपनी नाट्य संस्था ‘रंगकर्मी’ की स्थापना करने के लिए प्रेरित किया। ‘रंगकर्मी’ ने धीरे-धीरे कोलकाता के रंगमंच पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। इस संस्था ने हिंदी नाट्य परंपरा को बंगाली दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाया और हिंदी रंगमंच को पूर्वी भारत में नई ऊर्जा प्रदान की।

ऊषा गांगुली का निर्देशन सदैव सामाजिक सरोकारों से जुड़ा रहा। वे रंगमंच को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का औजार मानती थीं। उनके नाटकों में स्त्री की स्थिति, वर्गभेद, हिंसा, शोषण और मानवीय संवेदनाओं के विविध आयाम देखने को मिलते हैं। उन्होंने अपने कार्य से यह सिद्ध किया कि रंगमंच समाज का आईना ही नहीं, बल्कि परिवर्तन का औजार भी है। परंतु उनके रंगमंच का महत्त्व केवल सामाजिक यथार्थ की प्रस्तुति तक सीमित नहीं था — उसमें स्त्री की चेतना, वर्ग-संघर्ष की जटिलता और रंगमंच की सौंदर्य-दृष्टि, तीनों का समागम हुआ।

“महाभोज” – मन्नू भंडारी के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित यह नाटक ऊषा गांगुली के निर्देशन में एक सशक्त राजनीतिक वक्तव्य बन गया। इसमें सत्ता, भ्रष्टाचार और जनसंघर्ष के तीखे चित्रण ने दर्शकों को झकझोर दिया। “रूदाली” – महाश्वेता देवी की कहानी पर आधारित इस नाटक में ऊषा गांगुली ने समाज में स्त्री की त्रासदी को करुण यथार्थ के रूप में प्रस्तुत किया। यह नाटक उनकी पहचान का प्रतीक बना और भारत के साथ विदेशों में भी खूब सराहा गया। “होली” – महेश एलकुंचवार के नाटक का यह मंचन मनोवैज्ञानिक गहराई और सांस्कृतिक प्रतीकों से भरा हुआ था। “कोर्ट मार्शल”, “लोककथा”, “अंतिगोनी”, “हजार चौरासी की माँ”, और “काशीनामा” जैसे नाटकों में भी उनकी सामाजिक दृष्टि और सौंदर्यबोध स्पष्ट रूप से झलकता है।
ऊषा गांगुली के निर्देशन में नाट्य की दृश्य संरचना अत्यंत सटीक होती थी। उनके मंचन में प्रतीकों और प्रकाश के प्रयोग से गहन भावनात्मक वातावरण निर्मित होता था। वे संवादों की बजाय दृश्य-भाषा के माध्यम से संवेदनाओं को अधिक प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती थीं। यहाँ उनकी दृष्टि केवल नाट्य पुनरावृत्ति की नहीं, बल्कि पुनर्संरचना की थी। उन्होंने साहित्यिक कृतियों को मंचीय भाषा में रूपांतरित करते समय दृश्य-यथार्थ को प्रतीकात्मक संरचना में ढाला — जिससे सामाजिक पीड़ा न केवल कहानी का विषय रही, बल्कि मंच की देहभाषा बन गई। 

एक अभिनेत्री के रूप में ऊषा गांगुली ने भारतीय रंगमंच को कई यादगार भूमिकाएँ दीं। वे स्वयं भी अपने नाटकों में अभिनय करती थीं। “रूदाली” में संनिचरी की भूमिका में उनका अभिनय आज भी भारतीय रंगमंच के इतिहास में अमर है। उनकी अभिनय शैली में गहरी अंतर्दृष्टि, नियंत्रित भावाभिव्यक्ति और मानवीय पीड़ा का सजीव चित्रण देखने को मिलता था।

ऊषा गांगुली का रंगमंच केवल कलात्मक प्रयोगों तक सीमित नहीं था। वे स्त्री अधिकारों और सामाजिक न्याय के प्रश्नों को केंद्र में रखती थीं। उनके नाटकों में नारी अपने अस्तित्व की तलाश करती दिखाई देती है। “रूदाली”, “महाभोज” और “काशीनामा” जैसी प्रस्तुतियाँ स्त्री की संवेदनशीलता, संघर्ष और आत्मसम्मान का प्रतीक बन गईं। इसके अतिरिक्त वे झुग्गी-बस्तियों के बच्चों के लिए नाट्य कार्यशालाएँ भी आयोजित करती थीं और समाज के हाशिए पर खड़े लोगों को रंगमंच के माध्यम से अभिव्यक्ति का अवसर देती थीं। ऊषा गांगुली का रंगमंच शुद्ध यथार्थवादी नहीं था। वे मंच को केवल घटनाओं का प्रस्तुतीकरण नहीं मानती थीं, बल्कि उसे “भाव-संरचना” (emotional architecture) के रूप में देखती थीं। उनके निर्देशन में दृश्य-प्रतीक, प्रकाश, वेशभूषा और संगीत — सभी संवाद का हिस्सा बन जाते थे।

ऊषा गांगुली का रंगकर्मी न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी चर्चित रहा। उनके नाटकों का मंचन यू.के., पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में हुआ। हिंदी रंगमंच को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठा दिलाने में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। भारत सरकार ने उन्हें 1990 में ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें पश्चिम बंगाल राज्य अकादमी पुरस्कार, पद्म श्री (2015) और अनेक अन्य सम्मानों से भी नवाजा गया।

प्रशिक्षिका के रूप में ऊषा गांगुली ने सैकड़ों विद्यार्थियों को नाट्यकला का प्रशिक्षण दिया। वे मानती थीं कि रंगमंच केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि शिक्षा और चेतना का माध्यम है। उनके निर्देशन में नाटक पढ़ना, लिखना और प्रस्तुत करना एक संवाद की प्रक्रिया बन जाता था। उनकी शिक्षण पद्धति में अनुशासन, संवेदना और सामाजिक दृष्टि तीनों का सुंदर संतुलन दिखाई देता था।

ऊषा गांगुली का जीवन अंतिम दिनों तक सक्रिय रहा। वे वृद्धावस्था में भी रंगकर्मी संस्था से जुड़ी रहीं और युवा कलाकारों का मार्गदर्शन करती रहीं। 23 अप्रैल 2020 को हृदयाघात से उनका निधन हुआ। उनकी संस्था ‘रंगकर्मी’ आज भी उनके विचारों और रंगदृष्टि को आगे बढ़ा रही है। 
ऊषा गांगुली का रंगमंच न तो केवल स्त्री विमर्श था, न केवल राजनीतिक प्रतिरोध — वह जीवन के सम्पूर्ण यथार्थ का एक आत्मसंघर्ष था। उनके रंगकर्म में करुणा और क्रांति दोनों साथ चलते हैं। वे मंच पर केवल कहानियाँ नहीं कहती थीं; वे समाज के मौन को स्वर देती थीं। ऊषा गांगुली ने भारतीय रंगमंच को भाव और विचार के संतुलन की नयी भाषा दी। उनके नाटकों ने दर्शकों को केवल रुलाया नहीं, उन्हें सोचने पर मजबूर किया। यही किसी भी सच्चे रंगकर्मी की पहचान है — और इसी अर्थ में ऊषा गांगुली भारतीय रंगमंच की एक युग-निर्माता शख्सियत हैं।

ऊषा गांगुली का नाम भारतीय रंगमंच के इतिहास में एक ऐसी शख्सियत के रूप में दर्ज है जिन्होंने भाषा, संस्कृति और समाज के बीच की दीवारें तोड़ीं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि कला तभी सार्थक है जब वह समाज की धड़कनों से जुड़ी हो। वे न केवल रंगकर्मी थीं, बल्कि एक आंदोलन थीं — एक ऐसी स्त्री जिन्होंने मंच को अपने विचारों की आवाज़ बनाया और रंगमंच को लोक और जीवन के निकट ले आईं। उनकी नाट्ययात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-स्रोत बनी रहेगी — एक ऐसी यात्रा जिसमें कला और सामाजिक चेतना एक-दूसरे के पूरक हैं।

हबीब तनवीर : मिट्टी, संगीत और मनुष्य का रंगमंच जब रंगमंच जीवन बन जाता है

हबीब तनवीर : मिट्टी, संगीत और मनुष्य का रंगमंच

 जब रंगमंच जीवन बन जाता है

भारतीय रंगमंच के विशाल परिदृश्य में कुछ कलाकार ऐसे हैं जिन्होंने मंच की दीवारों को तोड़कर जीवन को ही रंगमंच बना दिया। वे नाटक को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि विचार, संवेदना और आत्म–संवाद का माध्यम मानते थे। ऐसे ही एक विलक्षण सृजन–पुरुष थे — हबीब तनवीर (1923–2009) — जिनका रंगमंच भारतीय लोक और आधुनिक विचार का सेतु है। हबीब साहब लेखक थे, अभिनेता थे, निर्देशक थे, और सबसे बढ़कर एक ऐसे जन–कलाकार थे जिन्होंने यह साबित किया कि लोक ही भारतीय आधुनिकता की जड़ है। उनका नाट्य–दर्शन मिट्टी की सादगी, लोक की लय और मानवीय विवेक की गहराई से निर्मित था।

1923 में रायपुर (छत्तीसगढ़) में जन्मे तनवीर का प्रारंभिक जीवन लोक–संस्कृति के बीच बीता। उनके बचपन का संसार था — गाँव के मेलों में गूँजता नाचा, पंडवानी की कथाएँ, ढोलक और मांदर की थाप, लोकगीतों की गूँज। यहीं से उन्होंने सीखा कि कला, जीवन से अलग नहीं होती। और फिर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ाई के दौरान वे उर्दू साहित्य और कविता से गहराई से जुड़े। आप कवि के रूप में वे “तनवीर” उपनाम से लिखते थे। लेकिन भीतर का कलाकार दृश्य–अभिव्यक्ति की तलाश में था, जिसने उन्हें नाटक की ओर खींच लिया। दिल्ली आने के बाद वे इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (IPTA) से जुड़े — जहाँ उन्होंने कला को सामाजिक प्रतिबद्धता से जोड़ने का सबक सीखा।

बाद में वे इंग्लैंड के रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट और जर्मनी के बर्लिनर एसेम्बल गए, जहाँ ब्रेख्त के “एपिक थियेटर” से प्रभावित हुए। किन्तु जब वे भारत लौटे, तो उन्होंने यह महसूस किया कि भारतीय रंगमंच की आत्मा पश्चिम में नहीं, अपनी लोक–मिट्टी में छिपी है।

‘नया थियेटर’ की स्थापना : लोक और आधुनिकता का मिलन

 हबीब तनवीर ने ‘नया थियेटर’ की स्थापना की। यह केवल संस्था नहीं थी, बल्कि भारतीय रंग–संस्कृति के पुनर्जागरण की प्रयोगशाला थी। यहाँ उन्होंने लोक कलाकारों के साथ काम करना शुरू किया — जिनमें से अधिकतर निरक्षर थे, पर अभिनय उनके जीवन की भाषा थी। तनवीर कहते थे — “मैं कलाकार नहीं चुनता, मैं मिट्टी चुनता हूँ। और उस मिट्टी में जो जीवन है, वही मेरे नाटक में बोलता है।” उन्होंने छत्तीसगढ़ी नाचा कलाकारों को आधुनिक नाट्य–संरचना में जोड़ा, जिससे बना एक नया रूप — लोक–आधारित आधुनिक रंगमंच, जहाँ संगीत, हास्य, लोककथा और विचार सब एक साथ बहते हैं।

‘आगरा बाजार’ (1954): जनता की भाषा में नाटक का जन्म

‘आगरा बाजार’ तनवीर का पहला बड़ा प्रयोग था। इस नाटक ने भारतीय रंगमंच को नयी भाषा दी — न जनता से ऊपर, न मंच की दीवारों में कैद। यह नाटक कवि नज़ीर अकबराबादी के जीवन और उनकी जनभाषा की कविताओं पर आधारित था। दिल्ली की सड़कों पर इसका मंचन हुआ — पहली बार भारतीय नाटक दीवारों से निकलकर सड़क पर आया। तनवीर ने कहा — “जब जनता की भाषा मंच पर आई, तब मैंने जाना कि रंगमंच जीवित हो गया।” इस नाटक ने दिखाया कि लोकभाषा भी गंभीर कला की भाषा हो सकती है। ‘आगरा बाजार’ ने भारतीय थिएटर को ‘भद्रलोक’ की परिधि से निकालकर आम जनता के बीच पहुँचा दिया।

‘चरणदास चोर’ (1975): नैतिकता का लोक–महाकाव्य

‘चरणदास चोर’ तनवीर की सबसे चर्चित रचना है। यह नाटक एक ऐसे चोर की कथा कहता है जो सच बोलने की शपथ लेता है और अंततः उसी सच के लिए मृत्यु को स्वीकार करता है। यह नाटक हास्य के आवरण में गहरी दार्शनिकता लिए है। यह बताता है कि सत्य और नैतिकता सत्ता से बड़ी होती है। लोककथा की सरलता और ब्रेख्तीय संरचना के साथ यह नाटक आधुनिक समाज पर तीखा व्यंग्य भी है। गीत, नाच, ढोलक और छत्तीसगढ़ी बोली की सहजता इसे लोक–महाकाव्य का रूप देती है। तनवीर कहते थे — “ब्रेख्त ने मुझे सिखाया कि रंगमंच सोच सकता है, और मेरे गाँव ने सिखाया कि रंगमंच गा भी सकता है।” जबकि हबीब साहब ब्रेख़्त से कभी मिल नहीं पाए!

‘मिट्टी की गाड़ी’ और ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ : परंपरा और रूपांतरण

‘मिट्टी की गाड़ी’ (मृच्छकटिक) में तनवीर ने संस्कृत नाटक की आत्मा को छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति में रूपांतरित किया। यह प्रयोग भारतीय नाट्य–परंपरा को पुनर्जीवित करने वाला था। ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ (धर्मवीर भारती की कथा पर आधारित) में उन्होंने कथावाचक परंपरा और दृश्य–मंचन को एक किया। यह नाटक आधुनिक कथा–संरचना और लोककथात्मक शैली का अद्भुत समन्वय है।

‘पोंगा पंडित’, ‘जहरीली हवा’ और सामाजिक व्यंग्य

‘पोंगा पंडित’ में तनवीर ने धार्मिक पाखंड और जातिवाद पर व्यंग्य किया। ‘जहरीली हवा’ में औद्योगिक प्रदूषण और पूँजीवादी व्यवस्था की क्रूरता पर। ये नाटक बताते हैं कि तनवीर का रंगमंच केवल लोक–उत्सव नहीं, बल्कि लोक–विवेक की आवाज़ है।

बाल रंगमंच : मासूमियत में जीवन का रंग

हबीब तनवीर के रंगकर्म का एक विशेष और अक्सर कम चर्चा किया गया पक्ष है — उनका बाल रंगमंच। उनका विश्वास था कि बच्चे केवल दर्शक नहीं, भविष्य के रंगकर्मी हैं। उनके बाल नाटक बच्चों की जिज्ञासा, कल्पना और सहज हास्य से भरे हुए थे, और वे शिक्षा को मनोरंजन के माध्यम से जोड़ते थे।

1. “राजरानी की रसोई”

यह एक हास्य–प्रधान बाल नाटक था जिसमें एक आलसी राजा और उसकी जिज्ञासु बेटी की कहानी थी। नाटक में बच्चों को यह सिखाया गया कि काम में आनंद है, और हर व्यक्ति अपने श्रम से रसोई का स्वाद बढ़ा सकता है।

2. “अकबर और बीरबल की कहानियाँ”

तनवीर ने अकबर–बीरबल की कहानियों को छत्तीसगढ़ी लहजे और लोकगीतों के साथ बच्चों के लिए रूपांतरित किया। यह नाटक लोक–कथाओं के माध्यम से बुद्धिमत्ता और विवेक का पाठ पढ़ाता है।

3. “मछली जल की रानी है”

यह बाल नाटक पर्यावरण और जल–संरक्षण के विषय पर आधारित था। छोटे कलाकारों ने इसमें लोकगीतों और नाच के माध्यम से जल और प्रकृति की महत्ता को व्यक्त किया।

4. “तितली का सपना”

इस नाटक में एक तितली के माध्यम से बच्चों को कल्पना और स्वतंत्रता की शिक्षा दी गई। नाटक का हर दृश्य रंग, संगीत और प्रतीकात्मकता से भरा था — बच्चों के मनोविश्व के अनुरूप।

5. “अरे वाह रे छोटू!”

यह नाटक शहरी–ग्रामीण बच्चों के बीच संवाद रचता है। तनवीर ने इसमें दिखाया कि ग्रामीण बालक की सादगी और शहरी बालक की जिज्ञासा एक साथ मिलकर जीवन की सुंदरता रच सकती है।

तनवीर साहब मानते थे कि बच्चों के लिए नाटक केवल ‘कहानी सुनाने’ का माध्यम नहीं, बल्कि सोचने और सपने देखने की प्रक्रिया है। वे कहा करते थे —“बच्चों में नाटक का अर्थ है — जीवन को पहली बार समझना।” उनके बाल नाटकों में उपदेश नहीं, बल्कि अनुभव और खेल है। वे बच्चों के साथ अभिनय करते समय मंच को खेल का मैदान बना देते थे — जहाँ संगीत, गीत, चित्र और गति एक साथ बहते हैं। उनका यह दृष्टिकोण आज के बाल–रंगमंच के लिए आदर्श है, क्योंकि यह कल्पना और विचार दोनों को समान स्थान देता है।

लेखन में लोक के भाषा की गहराई।

तनवीर के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता थी उनकी जनभाषा की सजीवता। वे कहते थे —“मेरी भाषा वही है जो जनता की ज़ुबान पर है।” उनके संवाद सरल होते हुए भी गहरे होते थे। लोककथा और आधुनिक दर्शन एक ही वाक्य में मिल जाते थे। उनकी भाषा संगीत की तरह बहती है — उसमें तुक, लय और भाव है।तनवीर का निर्देशन केवल दृश्य नहीं, बल्कि सत्य के लय की रचना था। वे मंच पर तभी संतुष्ट होते जब अभिनेता रंग में नहीं, भाव में डूब जाए। उनकी नाट्य–संरचना में विशाल सेट नहीं, बल्कि सरल प्रतीक और अभिनेता का कौशल प्रमुख था। वे कहते थे — “मेरे लिए मंच कोई जगह नहीं, एक स्थिति है — जहाँ अभिनेता और दर्शक एक हो जाएँ।”

तनवीर स्वयं भी अद्भुत अभिनेता थे। उनका अभिनय स्वाभाविक, आत्मीय और भावपूर्ण होता था। वे अपनी उपस्थिति से मंच को ऊर्जा से भर देते थे। ‘आगरा बाजार’ और ‘चरणदास चोर’ में उन्होंने अभिनय और निर्देशन दोनों में अपने कौशल का शिखर छुआ।

(1) लोक कलाकारों का आत्मविश्वास

दिल्ली में ‘चरणदास चोर’ के मंचन से पहले आलोचकों ने कहा — “देहाती कलाकार बड़े शहर के दर्शकों को नहीं समझ पाएँगे।” तनवीर ने जवाब दिया — “दर्शकों को समझना है, कलाकार तो खुद जीवन हैं।” और मंचन के बाद वही कलाकार तालियों की गड़गड़ाहट में नायक बन गए।

(2) सड़क पर रंगमंच

'आगरा बाजार’ को सड़क पर खेलते हुए जब राहगीर खुद दर्शक बन गए, तो तनवीर बोले — “यही है असली रंगमंच — जहाँ दीवारें नहीं, दिलों के दरवाज़े खुलते हैं।”

(3) बाल नाटक में बच्चों की स्वतःस्फूर्तता

‘तितली का सपना’ के मंचन में एक बच्ची अचानक संवाद भूल गई और अपने शब्द खुद बना लिए। तनवीर मुस्कुराए — “यही असली अभिनय है — जब जीवन अपने संवाद खुद लिखता है।”

हबीब तनवीर को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1969), पद्मश्री (1983), पद्मभूषण (2002), कलिदास सम्मान और अनेक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले। परंतु उनकी सच्ची पहचान पुरस्कार नहीं, बल्कि जनता का प्रेम थी।

‘नया थियेटर’ आज भी उनके विचारों का जीवित प्रतीक है। उनके शिष्य आज भी गाँवों, स्कूलों, नगरों और उत्सवों में लोकनाट्य की मशाल जलाए हुए हैं। हबीब तनवीर का रंगमंच केवल मंच नहीं, मानवता का उत्सव है। उन्होंने दिखाया कि कला का असली अर्थ तब प्रकट होता है जब वह लोक से जुड़ती है, समाज को सोचने पर मजबूर करती है, और जीवन में संगीत भर देती है। उनके हर नाटक में हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा रंगकर्म वह है जो मनुष्य को उसकी मिट्टी से जोड़ दे। उनकी बाल नाट्य–दृष्टि यह याद दिलाती है कि हर बच्चा संभावित कलाकार है, बस उसे खेलते–खेलते सोचने की आज़ादी चाहिए।

हबीब तनवीर साहब आज भी भारतीय रंगमंच की आत्मा हैं — एक ऐसी आवाज़ जो कहती है : “थिएटर अगर जनता से दूर हो गया, तो वह मर जाएगा। थिएटर को जीना है तो जनता की भाषा बोलनी होगी।”

बुधवार, 5 नवंबर 2025

ऊषा गांगुली : भारतीय रंगमंच की मर्मज्ञ साधिका

ऊषा गांगुली : भारतीय रंगमंच की मर्मज्ञ साधिका

ऊषा गांगुली : हिंदी रंगमंच की नारी दृष्टि और यथार्थ का आत्मसंघर्ष

भारतीय रंगमंच के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो न केवल अपनी प्रतिभा से, बल्कि अपनी वैचारिक दृष्टि और सामाजिक प्रतिबद्धता से भी अमिट छाप छोड़ जाते हैं। ऊषा गांगुली उन्हीं विशिष्ट व्यक्तित्वों में से एक थीं। वे एक ऐसी नाट्यकर्मी थीं जिन्होंने हिंदी रंगमंच को बंगाल की धरती पर प्रतिष्ठित किया, और सामाजिक यथार्थ को मंच पर जीवंत कर दिखाया। अभिनेत्री, निर्देशक, शिक्षिका और सामाजिक कार्यकर्ता — ऊषा गांगुली का जीवन रंगमंच की निरंतर साधना का पर्याय था।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

ऊषा गांगुली का जन्म 20 जनवरी 1945 को कोलकाता में हुआ था। साहित्य और नाट्यकला के प्रति उनकी रुचि बचपन से ही थी, किंतु उस समय किसी को यह आभास भी नहीं था कि वे एक दिन भारतीय रंगमंच की दिशा ही बदल देंगी। शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने अध्यापन को अपने पेशे के रूप में चुना। अध्यापन के साथ-साथ वे रंगमंच से भी जुड़ी रहीं, और यही जुड़ाव धीरे-धीरे उनके जीवन का केंद्र बन गया।

सत्तर के दशक में ऊषा गांगुली ने रंगमंच की दुनिया में कदम रखा। प्रारंभिक दौर में उन्होंने विभिन्न बंगाली नाट्य संस्थाओं के साथ काम किया, परंतु शीघ्र ही उन्हें यह महसूस हुआ कि हिंदी रंगमंच के लिए बंगाल में पर्याप्त मंच नहीं हैं। इसी सोच ने उन्हें 1976 में अपनी नाट्य संस्था ‘रंगकर्मी’ की स्थापना करने के लिए प्रेरित किया। ‘रंगकर्मी’ ने धीरे-धीरे कोलकाता के रंगमंच पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। इस संस्था ने हिंदी नाट्य परंपरा को बंगाली दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाया और हिंदी रंगमंच को पूर्वी भारत में नई ऊर्जा प्रदान की।

ऊषा गांगुली का निर्देशन सदैव सामाजिक सरोकारों से जुड़ा रहा। वे रंगमंच को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का औजार मानती थीं। उनके नाटकों में स्त्री की स्थिति, वर्गभेद, हिंसा, शोषण और मानवीय संवेदनाओं के विविध आयाम देखने को मिलते हैं। उन्होंने अपने कार्य से यह सिद्ध किया कि रंगमंच समाज का आईना ही नहीं, बल्कि परिवर्तन का औजार भी है। परंतु उनके रंगमंच का महत्त्व केवल सामाजिक यथार्थ की प्रस्तुति तक सीमित नहीं था — उसमें स्त्री की चेतना, वर्ग-संघर्ष की जटिलता और रंगमंच की सौंदर्य-दृष्टि, तीनों का समागम हुआ।

“महाभोज” – मन्नू भंडारी के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित यह नाटक ऊषा गांगुली के निर्देशन में एक सशक्त राजनीतिक वक्तव्य बन गया। इसमें सत्ता, भ्रष्टाचार और जनसंघर्ष के तीखे चित्रण ने दर्शकों को झकझोर दिया। “रूदाली” – महाश्वेता देवी की कहानी पर आधारित इस नाटक में ऊषा गांगुली ने समाज में स्त्री की त्रासदी को करुण यथार्थ के रूप में प्रस्तुत किया। यह नाटक उनकी पहचान का प्रतीक बना और भारत के साथ विदेशों में भी खूब सराहा गया। “होली” – महेश एलकुंचवार के नाटक का यह मंचन मनोवैज्ञानिक गहराई और सांस्कृतिक प्रतीकों से भरा हुआ था। “कोर्ट मार्शल”, “लोककथा”, “अंतिगोनी”, “हजार चौरासी की माँ”, और “काशीनामा” जैसे नाटकों में भी उनकी सामाजिक दृष्टि और सौंदर्यबोध स्पष्ट रूप से झलकता है।
ऊषा गांगुली के निर्देशन में नाट्य की दृश्य संरचना अत्यंत सटीक होती थी। उनके मंचन में प्रतीकों और प्रकाश के प्रयोग से गहन भावनात्मक वातावरण निर्मित होता था। वे संवादों की बजाय दृश्य-भाषा के माध्यम से संवेदनाओं को अधिक प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती थीं। यहाँ उनकी दृष्टि केवल नाट्य पुनरावृत्ति की नहीं, बल्कि पुनर्संरचना की थी। उन्होंने साहित्यिक कृतियों को मंचीय भाषा में रूपांतरित करते समय दृश्य-यथार्थ को प्रतीकात्मक संरचना में ढाला — जिससे सामाजिक पीड़ा न केवल कहानी का विषय रही, बल्कि मंच की देहभाषा बन गई। 

एक अभिनेत्री के रूप में ऊषा गांगुली ने भारतीय रंगमंच को कई यादगार भूमिकाएँ दीं। वे स्वयं भी अपने नाटकों में अभिनय करती थीं। “रूदाली” में संनिचरी की भूमिका में उनका अभिनय आज भी भारतीय रंगमंच के इतिहास में अमर है। उनकी अभिनय शैली में गहरी अंतर्दृष्टि, नियंत्रित भावाभिव्यक्ति और मानवीय पीड़ा का सजीव चित्रण देखने को मिलता था।

ऊषा गांगुली का रंगमंच केवल कलात्मक प्रयोगों तक सीमित नहीं था। वे स्त्री अधिकारों और सामाजिक न्याय के प्रश्नों को केंद्र में रखती थीं। उनके नाटकों में नारी अपने अस्तित्व की तलाश करती दिखाई देती है। “रूदाली”, “महाभोज” और “काशीनामा” जैसी प्रस्तुतियाँ स्त्री की संवेदनशीलता, संघर्ष और आत्मसम्मान का प्रतीक बन गईं। इसके अतिरिक्त वे झुग्गी-बस्तियों के बच्चों के लिए नाट्य कार्यशालाएँ भी आयोजित करती थीं और समाज के हाशिए पर खड़े लोगों को रंगमंच के माध्यम से अभिव्यक्ति का अवसर देती थीं। ऊषा गांगुली का रंगमंच शुद्ध यथार्थवादी नहीं था। वे मंच को केवल घटनाओं का प्रस्तुतीकरण नहीं मानती थीं, बल्कि उसे “भाव-संरचना” (emotional architecture) के रूप में देखती थीं। उनके निर्देशन में दृश्य-प्रतीक, प्रकाश, वेशभूषा और संगीत — सभी संवाद का हिस्सा बन जाते थे।

ऊषा गांगुली का रंगकर्मी न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी चर्चित रहा। उनके नाटकों का मंचन यू.के., पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में हुआ। हिंदी रंगमंच को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठा दिलाने में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। भारत सरकार ने उन्हें 1990 में ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें पश्चिम बंगाल राज्य अकादमी पुरस्कार, पद्म श्री (2015) और अनेक अन्य सम्मानों से भी नवाजा गया।

प्रशिक्षिका के रूप में ऊषा गांगुली ने सैकड़ों विद्यार्थियों को नाट्यकला का प्रशिक्षण दिया। वे मानती थीं कि रंगमंच केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि शिक्षा और चेतना का माध्यम है। उनके निर्देशन में नाटक पढ़ना, लिखना और प्रस्तुत करना एक संवाद की प्रक्रिया बन जाता था। उनकी शिक्षण पद्धति में अनुशासन, संवेदना और सामाजिक दृष्टि तीनों का सुंदर संतुलन दिखाई देता था।

ऊषा गांगुली का जीवन अंतिम दिनों तक सक्रिय रहा। वे वृद्धावस्था में भी रंगकर्मी संस्था से जुड़ी रहीं और युवा कलाकारों का मार्गदर्शन करती रहीं। 23 अप्रैल 2020 को हृदयाघात से उनका निधन हुआ। उनकी संस्था ‘रंगकर्मी’ आज भी उनके विचारों और रंगदृष्टि को आगे बढ़ा रही है। 
ऊषा गांगुली का रंगमंच न तो केवल स्त्री विमर्श था, न केवल राजनीतिक प्रतिरोध — वह जीवन के सम्पूर्ण यथार्थ का एक आत्मसंघर्ष था। उनके रंगकर्म में करुणा और क्रांति दोनों साथ चलते हैं। वे मंच पर केवल कहानियाँ नहीं कहती थीं; वे समाज के मौन को स्वर देती थीं। ऊषा गांगुली ने भारतीय रंगमंच को भाव और विचार के संतुलन की नयी भाषा दी। उनके नाटकों ने दर्शकों को केवल रुलाया नहीं, उन्हें सोचने पर मजबूर किया। यही किसी भी सच्चे रंगकर्मी की पहचान है — और इसी अर्थ में ऊषा गांगुली भारतीय रंगमंच की एक युग-निर्माता शख्सियत हैं।

ऊषा गांगुली का नाम भारतीय रंगमंच के इतिहास में एक ऐसी शख्सियत के रूप में दर्ज है जिन्होंने भाषा, संस्कृति और समाज के बीच की दीवारें तोड़ीं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि कला तभी सार्थक है जब वह समाज की धड़कनों से जुड़ी हो। वे न केवल रंगकर्मी थीं, बल्कि एक आंदोलन थीं — एक ऐसी स्त्री जिन्होंने मंच को अपने विचारों की आवाज़ बनाया और रंगमंच को लोक और जीवन के निकट ले आईं। उनकी नाट्ययात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-स्रोत बनी रहेगी — एक ऐसी यात्रा जिसमें कला और सामाजिक चेतना एक-दूसरे के पूरक हैं।

डॉ॰ लक्ष्मी नारायण लाल : हिन्दी नाट्य-साहित्य के नवोन्मेषी शिल्पी

डॉ॰ लक्ष्मी नारायण लाल : हिन्दी नाट्य-साहित्य के नवोन्मेषी शिल्पी

— लेखन : [मनोज कुमार मिश्रा]

डा॰ लक्ष्मी नारायण लाल हिन्दी नाट्य-जगत के उन विरल सृजनकारों में हैं जिन्होंने रंगमंच, आलोचना और कथा-साहित्य — तीनों को एक साथ नई दिशा दी। वे केवल लेखक नहीं, बल्कि विचारक, रंगकर्मी और शिक्षक भी थे। उनके नाटकों में भारतीय समाज की धड़कन, व्यक्ति-मन की जटिलता और युग-परिवर्तन की बेचैनी एक साथ दिखाई देती है।

जीवन और शिक्षा

डा॰ लाल का जन्म 4 मार्च 1927 को उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले के जलालपुर गाँव में हुआ। ग्रामीण जीवन ने उनके भीतर लोक-संवेदना और वास्तविकता के प्रति गहरी दृष्टि विकसित की। उन्होंने हिन्दी साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त की और “हिन्दी कहानियों के शिल्प-विधि का विकास” विषय पर पी-एच.डी. की उपाधि अर्जित की। उनका अकादमिक जीवन अध्यापन और शोध दोनों में सक्रिय रहा। वे अनेक विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों से जुड़े रहे, जहाँ उन्होंने नाट्य-शिक्षा और रंग-साहित्य को व्यावहारिक रूप से बढ़ावा दिया।

रचनात्मक यात्रा

डा॰ लक्ष्मी नारायण लाल की साहित्यिक यात्रा अत्यंत व्यापक रही। उन्होंने नाटक, उपन्यास, कहानी और आलोचना — सभी विधाओं में लेखन किया, किंतु उनकी ख्याति सर्वाधिक एक नाटककार के रूप में हुई। उनके लेखन में सामाजिक यथार्थ, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और प्रतीकात्मकता का अद्भुत संयोजन मिलता है।

उनका पहला उल्लेखनीय नाटक ‘अँधा कुआँ’ (1956) हिन्दी नाट्य-जगत में एक नई धारा लेकर आया। इसके बाद ‘मादा कैक्टस’ (1959), ‘मिस्टर अभिमन्यु’ (1971) और ‘दूसरा दरवाज़ा’ (1972) जैसे नाटकों ने उनके रचनात्मक कौशल की पहचान बनाई। इन नाटकों में समाज के भीतर फैले अन्याय, व्यक्ति-स्वातंत्र्य की संघर्षशीलता और आत्म-संघर्ष की गहरी पड़ताल की गई है।

विषय और दृष्टि

डा॰ लाल के नाटक मानव-जीवन की गहराइयों में उतरते हैं। उनके पात्र अपने परिवेश से जूझते हुए अस्मिता की खोज में निकलते हैं। वे सत्ता-संरचना, नैतिक पतन, स्त्री-स्वातंत्र्य और वर्गीय असमानता जैसे विषयों को मंच पर लाने का साहस करते हैं। उनका नाट्य-दर्शन इस विचार पर आधारित है कि रंगमंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज के आत्म-मंथन का माध्यम है।

उनकी रचनाओं में ‘नेपथ्य’ का उपयोग अत्यंत प्रतीकात्मक रूप में होता है। नेपथ्य उनके लिए केवल पर्दे के पीछे का हिस्सा नहीं, बल्कि मनुष्य के अवचेतन का वह क्षेत्र है जहाँ अनकहे भाव और अदृश्य घटनाएँ आकार लेती हैं। उनके नाटकों का स्वप्न-संरचना-प्रधान शिल्प उन्हें आधुनिक और मनोवैज्ञानिक दोनों दृष्टियों से विशेष बनाता है।

कथा और उपन्यास

नाटकों के अतिरिक्त डा॰ लाल ने कथा-साहित्य में भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनका उपन्यास ‘धरती की आँखें’ (1951) ग्रामीण जीवन और सामाजिक संघर्ष का सजीव दस्तावेज़ है। ‘बया का घोंसला’ में उन्होंने स्त्री-जीवन की कोमलता और संघर्ष को करुण संवेदना से चित्रित किया। उनकी कहानियाँ आम आदमी की जिजीविषा और नैतिक द्वंद्व को अभिव्यक्त करती हैं। वे पात्रों के भीतर चलने वाले विचार-संघर्ष को इतनी बारीकी से पकड़ते हैं कि पाठक स्वयं उस अनुभव का सहभागी बन जाता है।

भाषा और शिल्प

डा॰ लाल की भाषा सहज, स्वाभाविक और संवाद-प्रधान है। वे लोक-शब्दों, मिथकीय प्रतीकों और आधुनिक संवेदनाओं का ऐसा संतुलन रचते हैं कि नाटक केवल कथानक नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव बन जाते हैं। ‘मिस्टर अभिमन्यु’ में उन्होंने महाभारत के मिथक को आधुनिक मनुष्य के संघर्ष से जोड़कर एक नवीन प्रतीक-रचना प्रस्तुत की। उनके संवादों में लय, ताजगी और विचार की तीक्ष्णता साथ-साथ चलती है।

नाट्य-चिन्तन और आलोचना

डा॰ लाल ने केवल सृजन ही नहीं किया, बल्कि नाट्य-साहित्य पर गंभीर विचार भी किए। उनकी समीक्षात्मक कृतियाँ — ‘पारसी हिन्दी रंगमंच’, ‘रंगमंच और उसकी भूमिका’ तथा ‘हिन्दी कहानियों के शिल्प-विधि का विकास’ — हिन्दी नाट्य-विचार के क्षेत्र में मील का पत्थर मानी जाती हैं। उन्होंने भारतीय और पाश्चात्य नाट्य-परंपराओं के तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से यह दिखाया कि हिन्दी रंगमंच अपने लोक-तत्वों और आधुनिक संवेदनाओं से नई दिशा पा सकता है।

समाज और मानवीय दृष्टिकोण

डा॰ लाल का साहित्य समाज की गहराइयों को छूता है। वे मनुष्य के संघर्ष को किसी एक वर्ग या काल से नहीं बाँधते, बल्कि उसे सार्वभौमिक अनुभव के रूप में देखते हैं। उनके पात्र किसान, मजदूर, स्त्री या शिक्षक — सभी अपने समय की चुनौतियों से मुठभेड़ करते हुए आत्म-पहचान की खोज में लगे रहते हैं। उन्होंने दिखाया कि समाज में परिवर्तन केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक भी होना चाहिए। यही दृष्टि उन्हें यथार्थवादी लेखकों से अलग बनाती है।

रंगमंच से जुड़ाव

डा॰ लाल का जीवन रंगमंच से गहराई से जुड़ा रहा। वे स्वयं नाट्य-निर्देशन करते थे और नए कलाकारों को प्रशिक्षित करते थे। उनके नाटक ‘दूसरा दरवाज़ा’ को दिल्ली के रंग-समूहों ने अनेक बार मंचित किया। उनकी लेखनी में रंग-अनुभव की गंध है — यह विशेषता केवल उस लेखक में संभव है जिसने मंच की धड़कन को बहुत पास से महसूस किया हो।

व्यक्तित्व और मूल्य

डा॰ लाल विनम्र, गंभीर और चिंतनशील व्यक्ति थे। वे संवाद में संयमित किंतु विचारों में अत्यंत मौलिक थे। साहित्य उनके लिए केवल पेशा नहीं, जीवन-धर्म था। वे विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा-स्रोत और सहकर्मियों के लिए सृजनशील साथी थे। उनके जीवन में अध्ययन, अध्यापन और सृजन — तीनों का सुंदर संगम दिखाई देता है।

पुरस्कार और मान्यता

उनकी रचनात्मकता और नाट्य-सेवा को देखते हुए उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए। उनके नाटक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल किए गए और आज भी रंगकर्मियों द्वारा मंचित किए जाते हैं।

विरासत और प्रासंगिकता

20 नवम्बर 1987 को दिल्ली में उनके निधन के साथ हिन्दी नाट्य-साहित्य का एक उज्ज्वल अध्याय समाप्त हुआ, परन्तु उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी अपने समय में थीं। समाज, व्यक्ति और मूल्य-संघर्ष के प्रश्न आज भी वही हैं जिन्हें उन्होंने अपने नाटकों में उठाया था।

डा॰ लक्ष्मी नारायण लाल की विरासत केवल उनकी रचनाओं में नहीं, बल्कि उनके दृष्टिकोण में है — वह दृष्टि जो रंगमंच को जीवन का दर्पण मानती है। वे हमें सिखाते हैं कि साहित्य तभी सार्थक है जब वह मनुष्य के भीतर छिपे नेपथ्य को उजागर कर सके। उनके नाटक आज भी हिन्दी रंगमंच को दिशा देते हैं और आने वाली पीढ़ियों को सृजन के प्रति सजग बनाते हैं।

(लेखक हिन्दी नाट्य-साहित्य और भारतीय रंगमंच के अध्येता हैं।)

“पण्डित उगम राज और कुचामणी ख्याल की लोक-नाट्य परंपरा”

एक दूसरे के पूरक हैं “पण्डित उगम राज और कुचामणी ख्याल”

राजस्थान की मिट्टी अपने भीतर ऐसी लोक-सांस्कृतिक चेतना संजोए हुए है, जिसमें संगीत, नृत्य, नाट्य और अध्यात्म का अद्भुत संगम दिखाई देता है। इसी भूमि ने अनेक लोक कलाकारों को जन्म दिया जिन्होंने परंपरा और रचनाशीलता के सेतु बनकर समाज को कला के माध्यम से एक नई दृष्टि दी। इन्हीं में एक विशिष्ट नाम है — पण्डित उगम राज, जिनका जीवन और सृजन “कुचामणी ख्याल” के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित रहा।

कुचामणी ख्याल की उत्पत्ति और स्वरूप

कुचामण (जिला नागौर, राजस्थान) से उत्पन्न यह लोक-नाट्य परंपरा लगभग तीन सौ वर्षों से अधिक पुरानी मानी जाती है। यह एक संगीतात्मक नाटक शैली है जिसमें गान, वादन, अभिनय और संवाद की समान भागीदारी होती है। इसका आधार लोकभाषा, लोकसंगीत और लोककथाओं से निर्मित है।
इस नाट्य शैली में पुरुष कलाकार ही स्त्री भूमिकाएँ निभाते हैं, और प्रस्तुतियों में सामाजिक, धार्मिक या ऐतिहासिक कथाओं को व्यंग्य, हास्य और भावनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से जनसामान्य के समक्ष लाया जाता है।
यह शैली एक प्रकार से राजस्थान का “लोक-ऑपेरा” कही जा सकती है, जिसमें ढोल, नगाड़ा, हारमोनियम, शहनाई और तबले की ध्वनियाँ रंगमंचीय वातावरण रचती हैं।

पण्डित उगम राज का जीवन और कलायात्रा

पण्डित उगम राज (1926–2007) का जन्म नागौर जिले के कुचामण क्षेत्र में हुआ। बचपन से ही उनके भीतर संगीत और नाटक के प्रति विशेष अनुराग था। स्थानीय मेलों और जगरों में प्रदर्शन देखने के बाद उन्होंने “ख्याल” की विधा को जीवन का ध्येय बना लिया।
उनकी साधना केवल अभिनय तक सीमित नहीं रही; उन्होंने ख्याल की संगीत रचना, संवाद-लेखन, निर्देशन और प्रशिक्षण सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया। वे “उगम राज खिलाड़ी” के नाम से प्रसिद्ध हुए — यहाँ ‘खिलाड़ी’ शब्द का अर्थ मात्र कलाकार नहीं बल्कि उस लोक-रचनाकार से है जो मंच पर जीवन का सम्पूर्ण अभिनय कर सके।

पण्डित जी ने कुचामणी ख्याल के अनेक नाटकों में प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं — “गोपीचंद-भर्तृहरि”, “प्रह्लाद चरित”, “राणा प्रताप”, “धोला-मारू” जैसे नाट्य प्रकरण उनके प्रस्तुतियों के केंद्र में रहे। वे न केवल अभिनय के शिल्पी थे, बल्कि संवाद की लयात्मकता और गायन की भावाभिव्यक्ति को मिलाने की कला में भी निपुण थे।

ख्याल के संगीत का पुनरुद्धार

कुचामणी ख्याल के संगीत पक्ष को उगम राज ने नया जीवन दिया। उन्होंने लोक रागों — विशेषकर मांड, सोरठ, देश और बिलावल — का प्रयोग नाट्य गीतों में किया, जिससे यह शैली और भी आकर्षक बनी।
उनकी प्रस्तुतियों में न केवल मनोरंजन था, बल्कि एक गहरी संवेदनशीलता भी थी। संवादों के बीच गीतों की प्रविष्टि इस तरह होती थी कि दर्शक कथा के भाव-जगत से बाहर न जाए। यही उनकी अभिनय-कला की मौलिकता थी।

लोक और समाज के बीच सेतु

पण्डित उगम राज ने कला को लोक-जीवन से जोड़ा। वे मानते थे कि नाट्य का उद्देश्य केवल रंगमंचीय प्रदर्शन नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद है। उनकी प्रस्तुतियों में समकालीन समस्याएँ – जैसे स्त्री-सम्मान, लोभ, अन्याय, धर्म की विकृति और समाज की नैतिकता – को लोकभाषा की सहज शैली में प्रस्तुत किया जाता था।
उनके नाटकों में दर्शक केवल दर्शक नहीं, बल्कि सहभागी बन जाता था। यही कारण था कि गाँवों और कस्बों में जब “उगम राज की टोली” का प्रदर्शन होता, तो पूरा समाज उसमें सम्मिलित हो जाता।

प्रशिक्षण और संरक्षण कार्य

जीवन के उत्तरार्ध में पण्डित उगम राज ने “उगम राज खिलाड़ी लोक कला प्रशिक्षण एवं शोध संस्थान” की स्थापना की, जिसका उद्देश्य था लोक कलाकारों को प्रशिक्षण देना और इस dying art form को पुनर्जीवित करना।
उन्होंने युवा पीढ़ी को न केवल अभिनय सिखाया, बल्कि लोकसंगीत और पारंपरिक संवादों की संवेदनशीलता भी समझाई। इस संस्था के माध्यम से अनेक कलाकार आगे आए जिन्होंने बाद में दूरदर्शन, आकाशवाणी और सांस्कृतिक मंचों पर कुचामणी ख्याल का नाम पुनर्जीवित किया।

राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मान्यता

पण्डित जी को उनके योगदान के लिए विभिन्न सांस्कृतिक संस्थानों ने सम्मानित किया। राजस्थान साहित्य अकादमी, लोक कला मंडल, तथा संगीत नाटक अकादमी जैसे संस्थानों ने समय-समय पर उनकी प्रस्तुतियों को प्रोत्साहन दिया।
उनकी टोली ने जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, दिल्ली और मुंबई तक में प्रदर्शन किए। वे इस परंपरा को केवल ग्रामीण संस्कृति तक सीमित न रखकर राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने वाले पहले कलाकारों में गिने जाते हैं।

कला की विशेषताएँ और अभिनय-दर्शन

उगम राज के अभिनय में एक गूढ़ मनोवैज्ञानिक संवेदना दिखाई देती थी। उनके अनुसार, “ख्याल” केवल नाट्य नहीं, जीवन का विस्तार है। वे संवादों में नाटकीयता नहीं, बल्कि अनुभूति की गहराई लाने पर बल देते थे।
उनके अभिनय की सबसे बड़ी विशेषता थी – आवाज़ का प्रयोग और अभिव्यक्ति का संतुलन। वे पात्र की मनःस्थिति को आवाज़ की लय, गति और ठहराव से जीवंत कर देते थे।
उनकी मंचीय उपस्थिति में लोकभाषा का सौंदर्य, भावों की सरलता और हास्य का सूक्ष्म प्रयोग सम्मिलित रहता था।

परंपरा का उत्तराधिकार

पण्डित उगम राज के शिष्यों ने उनके मार्गदर्शन में इस कला को आगे बढ़ाया। उनके कुछ प्रमुख शिष्य आज भी राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के सांस्कृतिक मंचों पर कुचामणी ख्याल की प्रस्तुतियाँ करते हैं।
उनकी कला से प्रभावित नई पीढ़ी अब पारंपरिक विषयों के साथ-साथ आधुनिक सामाजिक विषयों पर भी ख्याल प्रस्तुत कर रही है। इस प्रकार पण्डित उगम राज का कार्य एक सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले चुका है।

अंतिम चरण और विरासत

2007 में पण्डित उगम राज का निधन हुआ, पर उनकी कला अब भी जीवित है। उनके रिकॉर्ड किए गए गीत, संवाद और नाटक आज लोककला के इतिहास का अमूल्य दस्तावेज हैं।
उनकी विरासत यह सिखाती है कि लोककला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति का संवाहक है। उन्होंने दिखाया कि परंपरा आधुनिकता की विरोधी नहीं, बल्कि उसकी जड़ है।

पण्डित उगम राज का जीवन हमें यह सिखाता है कि यदि कलाकार अपनी जड़ों से जुड़ा रहे, तो उसकी कला कभी मर नहीं सकती। उन्होंने जिस कुचामणी ख्याल को समाज की धड़कनों में पुनः जीवित किया, वह आज भी राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग है।
उनकी साधना, समर्पण और सृजनशीलता यह प्रमाणित करती है कि लोक-नाट्य केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि जीवित संस्कृति का दर्पण है। पण्डित उगम राज जैसे कलाकार ही वह सेतु हैं जो लोक और शास्त्र, परंपरा और आधुनिकता, और दर्शक तथा कलाकार के बीच संवेदनाओं का प्रवाह बनाए रखते हैं।