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रविवार, 16 अक्टूबर 2022

श्रेष्ठ


श्रेष्ठ


सफलता के अनेक रंग, रूप, आकार, प्रकृति होती है और समय के साथ बदलती रहती है

सफलता के अलग अलग विभिन्न स्तर होते है एक दिन में प्राप्त नहीं होती है और सफलता जीवन की कुछ इच्छाओं की आहूतियाँ मांगती है। जिसे देना पड़ेगा। इसलिए स्वयं कोई सफल नहीं होता बल्कि अन्य लोगों की दृष्टि में सफल होता हैI सफलता के हमारे मानक अपने आगे के पायदान में खड़े व्यक्ति को ही देखता है।

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022

* एक विक्रेता की मौत*

* एक विक्रेता की मौत*

चारों तरफ
गाड़ियाँ ही गाड़ियाँ
स्कूल ही स्कूल
हॉस्पिटल ही हॉस्पिटल
रास्ते ही रास्ते
कचड़ा ही कचड़ा
बंदूकें ही बन्दूकें
दास ही दास
मॉल ही मॉल
कल्पना ही कल्पना
कम ही इनके मालिक हैं
ज्यादातर पेट में
पत्थर बाँधकर
झोपड़पट्टियों और पटरियों में
दबे पड़े है।

(मनोज मिश्रा)

रविवार, 19 दिसंबर 2021

'जान' साथ होने पर यकीन करता हूँ

'जान' तुम्हारे होने का मैं यक़ीन करता हूँ और अगर दुनियावी लोगों को अपने ही जितना यकीन  दिला सकता। तो फिर हमारा इश्क समय के दायरे से बाहर हो जाता हमारी मुहब्बत के अमर होने का यही राज़ होता कि हमारी कहानियों को सुनाने और सुनने वाले को उस दुनिया की सैर करवाती जो इस काल खंड के परे है
कभी कभी लगता है समय के अनुसार मैं बहुत वषों बाद पैदा हुआ और इस समय में मेरी कोई खास उपयोगिता नहीं है और कभी लगता है कि थोड़ी देर और हो जाती तो........ संवेदनशीलता ने तो कहीं ज़्यादा जकड़ने की कोशिश तो शुरू नहीं कर दी है। यहाँ वजह सिर्फ इतनी ही है कि सौपें गए कार्यों को या स्वस्फूर्त किये जा रहे कार्यों को नए तरीके से देखने समझने और महसूस करने लगा हूँ, घिसेपिटे तौर-तरीकों से अब मेरा इत्तेफाक नहीं है। दायित्वों को अपने और तुम्हारे सम्बन्ध की मधुरता की तराजू में तौलकर उसका भाव तय करता हूँ।
बचपन सदैव सुख के दिन होने चाहिए या होते ही है, जो अब हमारे जीवन में कभी नहीं लौटेंगे। क्या मैं कभी बचपन की कोई भी स्मृति भुला सकता हूँ? उन दिनों के बारे में सोचकर हृदय प्रफुल्लित हो जाता है मुख में बार-बार स्मित मुस्कान छा जाती है अंतस में नवीन नूतन उत्कृष्ठता के अनुभव को महसूस करने लगता हूँ।
याद आता है कि मेरे लिये बातें सुनने के शौक को दबाना किस कदर मुश्किल था। और तुम हमेशा बातों को कहती रहती थी। इधर मैं तुम्हारी प्यारी, मधुर स्वर मंजरियों को सुनता रहता। नींद में डूब जाने के बाद भी मुझे तुम्हारी आकृति के पहलू में शांत विश्राम कर रहा हूँ।
अत्यधिक भीड़ में भी स्वयं अपने आपको समेट कर बैठ रहता। लोग सोचते थे/है। सोया हुआ है, सुस्त है, खोया हुआ है। जबकि मैं तुम्हारे शब्दों की खुशबू में तुम्हारे साथ उड़ता रहता था........आज भी तैरता रहता हूँ गोते लगाता रहता हूँ। यह सच है तुम अधिकतर मेरी कल्पना में दिव्य के रूप में ही दिखती हो इधर आकर तुम्हारा चेहरा अब तो और कम साफ दिखता है जितना करीब पहुंचना चाहता हूँ उतनी धुँधली और मोहक तुम्हारी तस्वीर हो रही है जिज्ञासाएँ तेज़ी से बढ़ रही है। नीद से आँखें बोझिल और पलकें नींद से भारी हो जाती है। सब लोग सो जाते है तब कभी आधी नींद में मुझे लगता है जैसे कोई मुझे अपने कोमल मुलायम हांथों से छू रहा है। मैं समझ तो जाता हूँ कि यह तुम्हारा स्पर्श है। और मीठा और चिर परिचित शब्द  कानों को सुनाई पड़ता है *उठो अब* और मैं अपने  दोनों बाजू  कंधे पर रख देता था और कहता हूँ मेरी प्यारी, मैं तुम्हें कितना ज्यादा चाहता हूँ।
और तुम्हारे होठो में उदास, मोहक मुस्कान सिमट आती है। मेरे माथे को चूमती हो सिर गोद में रख लेती हो और फिर उस दिन...........
अच्छा! तो तुम मुझे बहुत चाहते हो। चुप्पी। सच बताओं मुझे हमेशा प्यार करोगे? कभी नहीं भूलोगे? जब मैं नहीं रहूंगी तब.....भूलोगे तो नहीं न?
और निस्तब्ध देख रहा था मैं...............
...….…………....………………………....…

बुधवार, 21 जुलाई 2021

शहरी एवम ग्रामीण दर्शक

शहरी एवं ग्रामीण दर्शक

किन्तु भारतीय रंगमंचीय व्यवस्था में हम मुख्य रूप से दो हिस्से में बांटते है शहरी रंगमंच और ग्रामीण रंगमंच| शहरी और ग्रामीण रंगमंच की अपनी विशेषताएँ है| शहरी रंगमंच के दर्शक जहों अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने आते है वहीँ गाँवों के दर्शक अपना सम्बन्ध का निर्वाह करने आते है| शहरे रंगमंच में पैसे का महत्व होता है वहीँ गमीं दर्शक भाव प्रधान होकर आती है| शहरी रंगमंच के दर्शक में दिखावा ज्यादा होता है जबकि ग्रामीण दर्शक में सादगी रहती है| शहरी दर्शक कलाकार निर्देशक या प्रस्तुतकर्ता से मिल कर संतुष्ट करता है कि वह प्रस्तुति देखने आया था किन्तु ग्रामीण दर्शक प्रस्तुति को बहस में रखता है और अपने मानस पटल में अंकित कर लेता गाहे बगाहे उसका उद्धरण करता रहता है| शहरी दर्शक समय का पाबंद होता है जबकि ग्रामीण दर्शक, उत्साह और भाव से चलता है| समय का गुलाम नहीं है। शहरी दर्शक कार्यक्रम से ज्यादा मेलमिलाप के लिए आते है| ग्रामीण दर्शक आनन्द के लिए आते है| शहरी दर्शक स्वयं चरित्र बनकर आता है ग्रामीण दर्शक चरित्रों को देखने आता है| शहरी दर्शक में शोषक भी होते है| ग्रामीण दर्शक में अधिकतर शोषित ही होता है| शहरी दर्शक प्रायोजक बन आते है ग्रामीण दर्शक अपने क्षेत्र में प्रस्तुति है इसलिए आते है| शहरी आत्म केन्द्रित होते है जबकि ग्रामीण सहयोगी होते है| शहरी दर्शक चमत्कार/जादू पसंद करता है| ग्रामीण दर्शक गीत, संगीत और कलाकारी को महत्व देता है| शहरी दर्शक मंच में बुलावे के लिए आसक्त रहते है ग्रामीण दर्शक कार्यक्रम के भाव में डूबे रहते है| शहरी दर्शक आलोचक एवं तुलनात्मक होते है ग्रामीण दर्शक प्रयास की प्रशंसात्मक रहते है| शहरी दर्शक दर्शन देने आते है ग्रामीण दर्शक दर्शन लेने आते है| शहरी दर्शक चालाक होते है फायदा नुकसान देखकर ही निर्णय करते है ग्रामीण दर्शक ईमानदार होते है संस्कार और आदत के कारण देखते है| शहरी दर्शक राजनीतिक पक्ष से सम्बद्धता द्वारा फायदा तलाशते है| ग्रामीण दर्शक कार्यक्रम के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते है| शहरी दर्शक अपने मोबाईल की जरूरत पूरी करते है जबकि ग्रामीण अपने बच्चों के साथ कलाकारों की प्रतिभा को आंकते है| शहरी दर्शक उपहार स्वरुप निमंत्रण या रूपया प्रदान करते जब कि  ग्रामीण दर्शक कर्म प्रधान वस्तुओं को प्रदान करते है| किन्तु अपवाद सभी जगह होते है| और वर्तमान में भारतीय जनमानस आर्थिक असंवेदी युग है यहाँ भावनाएं ही सबसे पहले दम तोड़ती है| किन्तु जहाँ भावनाएं जीवित है वहीं सम्भावानाएं भी है हम सबको सतत सकारात्मक प्रयास से आगे बढ़ना होगा|  

ऐसी ही और भी बहुत सी विशेषताएँ होती है जो शहरी दर्शकों को ग्रामीण दर्शकों से अलग करती है| और ग्रामीण दर्शकों को विशेष बनाती है|

शनिवार, 16 मई 2020

सवाल - जवाब

सवाल - जवाब

इन प्रश्नों के ऐसे उत्तर होने चाहिए।

क्यों?

क्यों नहीं।

कैसे?

ऐसे य चाहे जैसे।

क्या?

यही सब य आप बताएं।

कब?

तुरन्त।

कहॉ?

यहीं य कहीं भी।

कौन?

आप, मैं, हम सब।

नहीं?

हाँ,हाँ,हाँ।

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

बाली लोक कथालोक

बाली (लोक कथालोक)

त्रेता युग में राम जब अपनी जानकी की पतासाजी करते हुए सुग्रीव के पास पहुंचते है। तब सुग्रीव अपने और भाई बालि के संबंधों के बारे में पूरी सच्चाई बताते है तब राम ओट में छिपकर सुग्रीव और बालि के छद्मयुध्य में बाली को अपने बाण से घायल कर देते है। बालि राम से छुपा कर मारने का कारण पूँछता है तब राम नैतिकता का सार बताते है और मृत्यु को प्राप्त होते बालि को वरदान देते है कि दुनिया में तुम्हारा नाम अमर रहेगा तुम में अपने विरोधी योद्धा की आधी शक्ति तुम सोख लेते हो इस गुन से ही तुम अनाज के पौधे में सारे अनाज को पुष्पित पल्लवित और विकसित करके अन्न बनाकर उसे मजबूत कवच में सुरक्षित करोगे, जिसका नाम बालि होगा।

बाली अनाज को कई गुणा बना देता है।

मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

रंगमंच के फायदे, रंगमंचीय पर्यटन

ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के क्रिसमस संस्करण में प्रकाशित किया गया है जो इन्सान प्रत्येक महीने में रंगमचीय प्रस्तुतियों को देखता है वह सामान्य से ज्यादा स्वस्थ रहता है| समान्य से ज्यादा सुकून में रहता है| रोगों और व्याधियों का खतरा कम होता, मन प्रफुल्लित और सकारत्मक उर्जा से भरा रहता है| रंगमंचीय प्रस्तुतियों में नाटक, नृत्य, गायन, वादन, जादू, सर्कस, पारिवारिक फिल्में आदि विधाओं को शामिल किया गया था| 

शोध में रंगमंचीय प्रस्तुतियों के साथ ही कला संग्रहालयों को भी शामिल किया गया है| इन संग्रहालयों में मनुष्य तस्वीरों को देखता है रंगों को देखता है| रेखाओं को देखता है| संरचना को देखता है भावों पर विचार करता है इससे दिमाग़ संतुलित होता है उसमें सोचने, समझने और समझाने की प्रवृत्ति भी उभरती है|

यूनिवर्सिटी कालेज लन्दन के शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि आप यदि लम्बी ज़िन्दगी जीना चाहते है| तो इसके लिए आपको महीने में एक बार सभागारों, संग्रहालयों, आर्ट गैलरियों, सिनेमाघरों में घूमने जाना चाहिए| शोधकर्ताओं ने 50 वर्ष से अधिक उम्र के लगभग 7000 वयस्क व्यक्तियों के सेहद पर लगातार 12 वर्ष तक यह शोध किया है| और पाया कि जो लोग रंगमंच की किसी भी विधा को लगातार देखते रहते है और उन्हें पसंद करते रहते है उन्हें देखने जाते रहते है| उनकी जल्दी मृत्यु के जोखिम में 31 प्रतिशत की कटौती हो जाती है| इस शोध में लन्दन के शोधकर्ताओं ने दावा किया गया है| कि हर महीने एक बार रंगमंच देखने से किसी भी व्यक्ति की जल्दी मौत होने का खतरा कम हो जाता है| शोधकर्ताओं ने पाया कि कला से जुड़े लोगों की मृत्यु की संभावना में 14 प्रतिशत की कमी थी| शोध में ऐसे साक्ष्य मिले है कि जो लोग कला से जुड़े रहे, चाहे वे तस्वीरों की तारीफ ही कर रहे है| परन्तु उनके स्वस्थ को लाभ पहुंचा है| शोधकर्ताओं ने कहा कि महीने में सिर्फ एक बार भी थियेटर जाने से व्यक्ति के मानसिक स्वस्थ में सुधार हो सकता है| और रंगमंच व्यक्ति के शारीरिक गतिविधियों को भी प्रोत्साहित कर सकती है| हालांकि मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक गतिविधियों को विशेष ध्यान में रखते हुए आर्ट गैलरी को लम्बी उम्र के साथ जोड़ कर शोध किया गया| शोध के लेखक डॉक्टर डेजी फैन्कोर्ट ने कहा की इस बात के लिए अभी और परीक्षण करने की जरूरत है कि रंगमंच में जाने से जल्दी होने वाली मौतों को कैसे रोका जा सकता है| डॉक्टर डेजी फैन्कोर्ट ने प्रतिभागियों को औसतन 12 वर्ष तक देखा और इस नतीजे तक पहुंची|

शनिवार, 13 जुलाई 2019

बच्चे से थोड़ा बड़ा

बच्चे से थोड़ा बड़ा ही तो हूँ
40 की दहलीज़ पर खड़ा तो हूँ।
दम फूलता नही अभी तो दम भरता भी तो नही।
तुम्ही कहो गोद में खेलते बच्चे से थोड़ा छोटा ही तो हूँ

बुधवार, 14 नवंबर 2018

रीत प्रीत की

हुनर मक्कारी का क्या खूब सीखा है।
नाम याद रखते हो काम भूल जाते हो।।

प्रिय हो, प्रियतम हो, प्रेयसी हो।
रंग हो, रंगकर्म हो, रंगमंच हो।।

खैर तुम अपने हो, वो अब नज़दीक नहीं दिल के।
रैन गई, रीत गयी, प्रीत भई, सीख भई।।

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

सपना टूटेगा

सपना टूटेगा
…………

लाइट करता हूँ तो, सेट छूट जाता है।
सेट करता हूँ तो प्रापर्टी फिसल जाती है।
प्रापर्टी करता हूँ तो कॉस्ट्यूम छूट जाती है।
कॉस्ट्यूम करता हूँ तो मेकअप रगड़ जाता है।
मेकअप करता हूँ तो एक्टिंग भूल जाती है।
एक्टिंग करता हूँ डायरेक्शन बोल जाता है।
डायरेक्शन करता हूँ दर्शक भटक जाता है।
दर्शक ढूँढता हूँ और सरलीकृत दर्शक बनाता हूँ।
अंत में इंसान ढूँढता हूँ और इंसान बना रहना चाहता हूँ।
बस सपना है तो सपना ही सही।
करना है।
हमें ही सब करना है।

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

लोक संस्कृति और बाज़ारवाद

लोकसंस्कृति पर बाजारवाद हावी, चुनौतियां बढ़ीं

नए दौर में भारतीय लोकसंस्कृति पर बाजारवाद हावी है और लोकसंस्कृति को समझना और सहेजना चुनौतीपूर्ण हो गया है। संस्कृति का स्वामित्व बदला है, जिनका सरोकार गांव, गरीब, लोक संस्कृति, मनुष्य, पाठक, दर्शक या चिंतक से नहीं है। अपितु ग्राहक व विज्ञापनदाता से है।
इस नए दौर में गांव, गरीब व लोक की संस्कृति गायब हो गई है। बाजारवाद के दौर में संस्कृति के संरक्षकों को पोषकों को अच्छी पूँजी मिलने तो लगी, किन्तु साथ ही लोक के व्यवहार के प्रति असुरक्षा भी बढ़ी है। इसके चलते देश, समाज व संस्कृति के प्रति लोक का लगाव भी खत्म होता जा रहा है। कुछ त्यौहारों, कुछ संस्कारों ने और कुछ संबंधों ने हमें बांध रखा है अपनी संस्कृति के प्रति अन्यथा प्रायोजित कार्यक्रमों में घंटों गवां देने के बाद भी हमारे हाथ अधिकतर शून्य होता है। इसलिए हम कह सकते हैं  बाजार के दौर में संस्कृति मुख्य भूमिका से नेपथ्य में सरकती जा रही है। दुर्भाग्यजनक है कि रामलीला रासलीला नाच, माच, आदि भी समाप्त हो रही है। सारा ध्यान प्रयोगशीलता पर केंद्रित है। और अब तो कार्पोरेट घरानों के अलावा माफिया तक अब संस्कृति उत्सव और प्रतियोगिता का आयोजन करने लगे हैं। महंत जी, व्यास जी का स्थान पर प्रबंधक जी ने लिया हैं, जो सत्ता के गलियारों में लाइजनिंग कर सके। उन्होंने कहा कि हमारी लोक संस्कृति कई तरह के संकटों से गुजर रही है। सोशल मीडिया के प्रभाव ने सत्ता में परिवर्तन किया है, जिससे सत्ता को भी सजग रहना चाहिए। इन प्रबंधकों और जोड़ जुगाड़ फिट करने वालों से संस्कृति का क्या भलहोगा यह प्रश्न तो बनता है
आज कार्यक्रमों पर नियंत्रण पूंजीवादी कर रहे हैं। नए दौर में लोक पर पूंजी, तकनीक व संचार क्रांति हावी है, इसलिए संस्कृति पर चारों तरफ से चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों का मुकाबला सांस्कृतिकर्मियों को ही करना है। हमारी संस्कृति में वो ताकत है कि वह देश की राजनीति को साफ सुथरा आइना भी दिखाती है। संसार में पहले आदर्श का दौर था, लेकिन आज बहुत कुछ बदल गया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लोगों तक खबरे, रपटें, सूचनाएँं पहुंचाना आसान हो गया है। पाठक या दर्शक अब फीचर की जगह छोटी-छोटी खबरें पढ़ना या देखना पंसद करते हैं। रंगकर्म, लोकगीत, लोकनृत्य या जाति विशेष के व्यवहार आज विज्ञापन, प्रायोजकों और अनुदान पर निर्भर है, इसलिए कार्यक्रम की गुणवत्ता पर ध्यान न देकर उसके प्रचार -प्रसार पर ध्यान देते है। टारगेट दर्शकों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है बल्कि उनके टारगेट में कुछ और ही होता हैै, क्योकि लोककला के विकास और लोक कलाकारो के वेतन का भुगतान भी तो यहीं से आता है। जबकि आना चाहिए लोक से, लोक संस्कृति के रखरखाव की पूर्ण जिम्मेदारी लोक की ही होगी न कि सरकार की?
सोशल मीडिया से आए बदलाव के कारण लोक व्यवहार में हर जगह बदलाव आया है और उसके सम्मान का, स्थान का कुछ हद तक ह्रास भी हुआ है। सोशल मीडिया लोककलाकारों के लिए चुनौतीपूर्ण हो गई है। सोशल मीडिया ने कला को कलाकारों को, कलाकार से प्रचारक में बदल दिया है।
यह भूमंडलीकरण का दौर है जहां बाजारवाद अपनी चरम अवस्था में परचम लहरा रहा है। मानवीय मूल्यों का व्याकरण बराबर बदल रहा है। इस बदलने की गति में जब जीवन के उद्येश्य भी बदले हैं तो उथल-पुथल तो स्वाभाविक है, इसका फायदा लगातार बाजारवाद उठा रहा है। बाजार और बाजारवाद में घनीभूत अंतर है। बाजारवाद एक वृति है जो जीवन को मूल्यों से अलग करने का काम करती है। जहां भ्रांति ही एक पराकाष्ठा बन गई हो वहाँ निश्चित तौर पर विकल्पों की भीड़ दिखाई देगी। यह भीड़ सम्पूर्ण जीवन के पारंपरिक वितान को भाड़ में झोकने के लिए व्यापक भूमिका का निर्वहन करती है। ऐसे में मानवीय मूल्यों को बचाने के लिए व्यक्ति की सामाजिक लोकवादी चेतना से ही जमीनी ताकत मिलती है उसी के साथ खिलवाड़ करना कहाँ तक जायज है यह सोचने का विषय है।
भारतीय संस्कृति के मूल्य अपनी आधुनिकता के अतीत में अधिक मूल्यवान थे। आज संस्कृतिकर्मी अपनी ईमानदारी से दूर एक ठगी हुई समझदारी बन कर रह गया है। लेकिन बौद्धिकता की नीलामी जब संस्कृति की आवश्यकता बन गई हो तब यह सोचना कम खतरनाक नहीं है। इस तरह आज के समय में लोकसंस्कृति और बाजारवाद की जड़ों में परखना बहुत जरूरी काम है। इसका मूल्यांकन होना चाहिए। यह बात आज याद दिलाई जा सकती है। आज जब पूंजीवादी बाज़ारवाद के दौर में भूमंडलीकरण की चपेट से चरमराई हुई दुनिया हमारे सामने है यह बात उस समय सोची भी नहीं जा सकती थी जब लोक की संस्कृति, विभाजित हिंदुस्तान की संस्कृति अपने आधुनिकीकरण के दौर से गुजर रही थी। आधुनिकता एक बड़ा जीवन मूल्य है। समय में जीवन्तता का विराट स्वर आधुनिकता की गहनता से आता है। यह गहनता प्रगति के पथ पर नैसर्गिक चेतना से आती है। हमारी संस्कृति मनुष्यता को रूढ़ियों की जटिल संरचना से मुक्ति दिलाये। राजनैतिक संरक्षणों के अपने शुरुआती दौर में जनमाध्यमों के अभाव में भी भारतीय कलाकारों ने वह सब किया जिसे आज याद किया जा सकता है।  तब संस्कृति और संस्कार समाजिकता की आकांक्षी हुआ करती थी।
आर्थिक अभाव के इस युग में लोक कलाकारों अपनी जीवटता से इतिहास रचा है। कलाकारों की माली हालात किसी से छिपी नहीं हैं। लेकिन उनमे मानवीय जिजीविषा का अकूत उत्साह भरा था, जो हमारी संस्कृति को नवजीवन देता है।
किन्तु शासकीय अनुदानों और अन्य प्रायोजकों से भरे विस्थापित संस्कृति से कुछ भी बहुत श्रेष्ठ हमें मिलनेवाला है इस पर संदेह है साथ ही इस रास्ते के कई खतरे है, सबसे बड़ा खतरा तो सभ्यता और संस्कृति के असमय मृत्यु का है। लेकिन जब तक वह समाज में है कलाकारों का भरण पोषण समाज से है वह अपने अपनों के पास है  पुनः नई त्वरा के साथ नवीन संशोधित मूल्यों के साथ उभरती रहेगी।
भारतीय लोक संस्कृति दिन प्रतिदिन अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करती हुई प्रगति के पथ पर अग्रसर तो हुई। परंतु अपनों मे विश्वास और अविश्वास के बीच झूलते हुए। सम्पूर्ण भारत में लोकसंस्कृति पर कार्यक्रमों का एक सिलसिला चल पड़ा। कार्यक्रमों का योगदान हो सकता है परंतु अधिकतर लोक की संस्कृति के स्थान पर भोग की संस्कृति ने ली है 10 सदस्य और वहीं 10 ही मुखिया भी होते है  प्रताप नारायण मिश्र के शब्दों में “सरस्वती तो हमारे पेट में बसती है...जो सबका सर्वस्व हमारे पेट में ठांस-ठांस कर न भरे वही नास्तिक। जो हमारी बेसुरी तान पर वाह ! वाह ! न किए जाए वह कृश्तान और हमसे जो चूँ भी न करे वह दयानंदी।” इस तरह की बेबाक प्रतिक्रिया से वर्तमान लोक का विकास हो रहा है। लोकलुभावन संस्कृति के संकट से गुजरने के बावजूद अपनी सम्पूर्ण तत्परता से समाजिकता के पथ पर मनुष्यता के हित और अधिकारों की लड़ाई लड़ते विरले कलाकार भी है। जो वर्तमान सत्ता के लगातार टकराता रहा, यह इसकी जीवटता का ओज है। जैसे जैसे देश पूंजीवादी ढांचे में अपने को तब्दील करता गया, संस्कृति और सभ्यता उनके हाथ की कठपुतली बनती चली गई।
जिस तरह साम्राज्यवाद के गर्भ से पूंजीवाद का उदय हुआ उसी तरह पूंजीवाद से  बाज़ारवाद का भूमंडलीकरण का रास्ता खुला। दरअसल भूमंडलीकरण वैश्वीकरण की एक चाल है। यह जो पूरी दुनिया को एक गाँव में तब्दील कर देनी की एक परिभाषा भूमंडलीकरण के पुरोधाओं ने गढ़ी है, यह पूंजीवादी स्वप्न को साकार करने की एक ओछी मानसिकता है। यह विविधता के प्राकट्य भाव को प्रकृतिक मूल्यों से अलग करना चाहते हैं। यह पूरी दुनिया को एक सूत्र में छल लेने के आकांक्षी हैं। भूमंडलीकरण का स्वप्न प्रद्योगिकी और तकनीकी को एक संस्कृति के रूप में समाज में ला रहा है। जहां समाज की स्वायतता और निजता पर एक रणनीति के रूप में प्रहार किया जा रहा है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि प्रद्योगिकी और तकनीकी को भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़ अस्त्र के रूप में प्रयोग करना खतरनाक है, इसका उपयोग मनुष्यता के हित में भी हो सकता है। लेकिन इन सब पर जिस वर्चस्वशाली वर्ग (दलाल,कमीशनखोर )का कब्जा है, वह साम्राज्यवादी नीतियों के अनुयाई बाज़ार पैदा करने वाले लोग हैं। और आज लोक कलाकार भी इन्हीं के हाथों की कठपुतली बन कर रह गई है।
इधर कुछ वर्षों से ‘बाजारवाद’ शब्द का चलन काफी बढ़ा है। यह एक नई चाल है। अर्थशा्स्त्र का सहारा लेकर कुछ पूंजीवादी भट्टाचार्याओं ने नई भड़न्त बकनी शुरू की है कि बाजारवाद अर्थशास्त्र के शब्दकोश में ही नहीं है। दरअसल बाजारवाद एक जाल का नाम है जो इधर तेजी से फैल रहा है। यह पूंजीवाद का एक धारदार हथियार है, जो अपनी चपेट में लेकर व्यक्ति की निजता और स्वायत्तता को बेचने पर मजबूर करता है। इसका उदय दुनिया के ‘डिजिटलीकरण’ के साथ हुआ है। दुनिया की तेजी से जिस कदर डिजिटल हुई बाजारवाद ने उसे हथिया लिया। यहीं से सांस्कृतिक कार्यक्रमों के ईवेन्ट होने की कहानी शुरू होती है। इसका बड़ा कारण ‘डिजिटलीकरण’ है। आज कलाकार अपनी निजता और स्वायत्तता को बेचे  बिना जीवन यापन नहीं कर सकता, लोक कलाकारों को हॉट बनाकर पेश किया जा रहा है। इसी विज्ञापन प्रायोजित दौर को हमारे यहाँ बजारवाद कहा जाता है। बाजारवाद के बारे में कुछ सैद्धांतिक तथ्य भी देखने जरूरी हैं। क्योंकि यह टर्म पश्चिम से ही आया। पश्चिम के धनी देशों के लिए पूरब के विकासशील तमाम देश बाजार का मैदान बने हुये हैं। जहां वह चीजों को बेचने में सफल हो रहे हैं। बहरहाल एक महत्वपूर्ण परिभाषा को कोड करते हैं। बेंजामिन गिंसबर्ग का कहना है कि “पश्चिमी सरकारों ने बाजार कि कार्यप्रणाली का इस्तेमाल लोकप्रिय परिप्रेक्षों और भावनाओं को नियंत्रित करने में किया। ‘विचारों का बाजार’ जो उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के दौरान बना था, वस्तुतः उच्च वर्गों के विश्वासों और विचारों का प्रचार और निचले वर्गों कि विचारधारात्मक और सांस्कृतिक स्वतन्त्रता को दबाने का काम करता है। इस बाजार के निर्माण के जरिये पश्चिमी सरकारों ने सामाजिक आर्थिक स्थिति और विचारधारात्मक शक्ति के बीच मजबूत और स्थायी कड़ियाँ निर्मित की हैं, और उच्च वर्गों को इस बात कि इजाजत दी है कि वे अपने बीच से ही किसी अन्य के भरण पोषण के लिए एक दूसरे का इस्तेमाल करें।...खास तौर पर तौर पर सयुंक्त राज अमेरिका में विचारों के बाजार पर छाए रहने में उच्च और उच्च-मध्यवर्गों की क्षमता ने आम तौर पर इन तबकों को इस बात की इजाजत दी है कि वे समूचे समाज के राजनीतिक यथार्थबोध को और राजनीतिक तथा सामाजिक, सांस्कृतिक संभावनाओं को अपने तरीके से गढ़ें। पश्चिमी लोग जहां आम तौर पर बाजार को विचारों की आम स्वतन्त्रता के बराबर मानते हैं।
परन्तु भारतीय परिप्रेक्ष्य में वर्तमान संस्कृति हमेशा किसी एक द्वारा ही निर्देशित, मुक्त बाजार के कामकाज को लेकर उनके प्रस्थापनाओं पर आधारित है जो विशेषतया विवादास्पद नहीं हैं। जिसे शायद होना चाहिए। सांस्कतिक माध्यमों के वे हिस्से, जिनकी पहुँच एक अच्छे-खासे दर्शक-श्रोता वर्ग तक हो सकती है, वो शासकीय बड़े निगम हैं संचालनालय है। और वे अपने मूल विचार से भी कहीं ज्यादा राजनैतिक और साख रखने वाले समूहों से जुड़े हुये हैं। अन्य व्यापारों की तरह ही वे लोककला को उसके संस्कारों को हमारी लोक संस्कृति को एक उत्पाद की तरह ख़रीदारों को बेचते हैं। उनका बाजार है विज्ञापनदाताओं का वर्ग और हम उनके ‘उत्पाद’ हैं कलाकार-दर्शक-श्रोता। इसमें भी उनका खास पूर्वग्रह अपेक्षाकृत धनी कलाकार- सेलिब्रिटी-दर्शक-श्रोता की ओर होता है, जिनके कारण विज्ञापन की दरें बढ़ जाती हैं। हम उनके इशारे पर नाचते है। लोक लगातार शिकार होता रहता है। यह ठगी का एक तंत्र है।  लोक को संरक्षण देना एक किस्म का चमकीला मुलम्मा बन कर रह गया है। उधर लगातार बाजारू नाटकीयता द्वारा अपनी छाप लोक पर डाल कर जीवन-मूल्यों में एक भ्रम पैदा कर रही है। यह भ्रम इतना भयानक है कि इसके अगोस में एक भरी-पूरी पीढ़ी निरापद विचारशून्यता में जी रही है। और यही पीढ़ी अपने पूरे वर्ग के साथ देश के प्रमुख मंचों में बड़ा हिस्सा बन कर उभरती है।बाजार के प्रभाव में हमारा कोई भी जनपक्षधर मूल्य नहीं। हम दर्शकों को उनके मतलब की चीजें न दिखाकर अपने प्रायोजक के प्रयोजन की सामाग्री लगातार परोसते हैं। यह है हमारी संस्कृति नीति यानी आज की लोकसंस्कृति को बढ़ावा देने के दम्भ का दोगला चरित्र।
परिणाम :- हम कह सकते हैं कि हमारे सामने बदले हुये दौर का एक विशाल ऊसर मैदान पड़ा है। अब हम इसमे कहाँ तक भारतीय लोक के जीवन मूल्यों को तलाशें इसकी भी एक सीमा है। जो भी हो हम अखिलेश अखिल के शब्दों में कह सकते हैं- “शायद आप को यकीन न हो, लेकिन सच्चाई यही है कि लोक कलाकार और लोककला मूर्च्छा में है।और उसके पोषक और शोषक के कारण। मूर्छित लोकसंस्कृति खूब बिक रही है। लोगों के बीच इसकी काफी मांग है। ऐसी संस्कृति में दलालों की खूब चल रही है। दर्शकों के बीच इन दलालों की इज्जत है। समाज में इनकी प्रतिष्ठा है, रौब है।

मनोज कुमार मिश्रा
9165949213