बुधवार, 15 जून 2022
बनाने वाले के काम
बुधवार, 14 नवंबर 2018
रीत प्रीत की
हुनर मक्कारी का क्या खूब सीखा है।
नाम याद रखते हो काम भूल जाते हो।।
प्रिय हो, प्रियतम हो, प्रेयसी हो।
रंग हो, रंगकर्म हो, रंगमंच हो।।
खैर तुम अपने हो, वो अब नज़दीक नहीं दिल के।
रैन गई, रीत गयी, प्रीत भई, सीख भई।।
सोमवार, 22 जनवरी 2018
बघासुर
बघासुर (लोकआख्यान)
उमरिया शहडोल डिंडोरी और उसके आसपास के क्षेत्र में बाघ देवता की कथा प्रचलित है कथा के मूल में जंगल के राजा बाघ (शेर) हैं। कथा का रूप समयानुसार रूप बदल रहा है या यूं काहे कहे की ज्यादा प्रभावशील बन पड़ा है। कथा में आदिशक्ति के बाल रूप की चर्चा है। कथा देवी वैष्णव की कथा से मिलती है। उक्त कथा में पूरा प्रसंग वैष्णव देवी का और भैरव की सत्ता को जड़ से उखाड़ने की है साथ ही आम जन के मन उत्पन्न भैरव के भय को उनके मन में मारने का रूप प्रस्तुत करते है। कथा में गीत है किहनी कहनूत उक्खान और पहेलिया बहुतायत में है।
मूल कथा तो तकरीबन सभी स्थानों पर एक सी ही है। पर सुनते समय कथा को सुनाने से होनेवाले मनोरंजन का प्रभाव हमेशा ही अलग होता रहता है
रविवार, 26 नवंबर 2017
रीवा में आराध्य देवी शक्तिपीठ
आराध्य देवियाँ रीवा जिला
दक्षिण में बालाजी, उत्तर में मां वैष्णो देवी। विंध्य में मां शारदा और विंध्यवासिनी। पश्चिम में पुष्कर तो पूर्व में बंगाल की मां काली। हर तीर्थ और मंदिर का अपना इतिहास है, लेकिन बात रीवा रियासत की करें तो यह देश का इकलौता स्थान है, जहां नौ देवियां सैकड़ों साल से अपनी कृपा बरसा रही हैं। बघेल राजाओं द्वारा नौ देवियों को स्थापित करने का उद्देश्य दुश्मनों की बुरी नजर से बचना, रियासत में सुख-शांति था। पेश है रिपोर्ट...।
मां कालका मंदिर: रानी तालाब में रीवा शहर का सबसे चर्चित मंदिर है। यहां पर मां कालका विराजमान हैं। नवरात्र में हजारों भक्त माथा टेकते हैं। कहते हैं मन की भावनाओं को भांप कर मां प्रसन्न हो जाती हैं। यहां सिद्धि के लिए बलि भी दी जाती है। मां की प्रतिमा 450 वर्ष पूर्व एक व्यापारी दल ने यहां छोड़ दी थी। रीवा रियासत के राजाओं ने इस स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया। ऐसी किदवंती है। वर्तमान में यहां भव्य मंदिर है।
महिषासुर मर्दनी
राजवंश की देवी के रूप में महिषासुर मर्दनी की स्थापना रीवा किले के जगन्नाथ परिसर में की गई थी। तब से इनकी पूजा-अर्चना होती आ रही है। नवरात्र के दिनों में यहां पर भक्तों की आस्था देखते ही बनती है। महामृत्युंजय भगवान के साथ महिषासुर मर्दनी के दर्शन सौभाग्यशाली होते हैं।
मां उग्रतारा देवी
रीवा किले के बाहर उपरहटी में बंगाली टोला में मां उग्रतारा देवी का मंदिर स्थित है। कहते हैं भगवान शंकर को मां उग्रतारा देवी ने ही दूध पिलाया था। मां उग्रतारा से ही भगवान शंकर को तीसरा नेत्र प्राप्त हुआ था। नवरात्र में मां के दरबार में भक्तों का डेरा लगता है।
कौमारी माता
रीवा किले के पूर्वी हिस्से के अखाड़घाट में स्थित कौमारी माता का मंदिर है। आस्था का यह केंद्र है। कहते हैं कि जिन कन्याओं का विवाह नहीं होता है। यहां पूजन के बाद उनका विवाह जल्द होने की संभावना रहती है। इसी आकांक्षा में मां के दरबार में युवतियां माथा टेकने आती हैं।
मां फूलमती देवी
रीवा शहर में समान तिराहे से बाण सागर कालोनी आते समय नए बस स्टैंड के पीछे मां फूलमती देवी का मंदिर है। जिन्हें रीवा राज्य के राजाओं द्वारा स्थापित किया गया था। फूलमती देवी जिन्हें वन देवी के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्र में इनकी पूजा-अर्चना फलदायी होती है।
मां जालपा देवी
उपरहटी में किले के बाहर मां जालपा देवी की प्रतिमा स्थापित है। किले से 150 मीटर की दूरी पर रीवा रियासत के राजाओं ने इस मंदिर की नींव रखी थी। यह देवी मंदिर अखंड ज्योति का प्रतीक है। इन्हें ज्वाला देवी का स्वरूप माना जाता है।
मां शीतला माता
अमहिया मोहल्ले के रास्ते पर स्थित मजार के पास नीम के पेड़ के नीचे मां शीतला माता का मंदिर स्थापित है। यह देवी आपदा, महामारी से तो बचाती ही हैं, बच्चों की रक्षा के लिए जानी जाती हैं। जहां माताएं शीतला अष्टमी को चूड़ी मिष्टान चढ़ाती हैं।
मां विंध्यवासिनी देवी
रीवा शहर के तरहटी मोहल्ले में नगरिया स्कूल के आगे स्थित मां का मंदिर हर दिन आस्था का केंद्र है। कहते हैं पृथ्वी की उत्पत्ति से ही विंध्य पर्वत का उदय हुआ था। माता देवकी के कारण से जन्मी और मामा कंस के हाथों से पटकी गई देवी ही मां विध्यवासिनी हैं।
मां शारदा मंदिर
रीवा में फोर्ट रोड स्थित सुदर्शन कुमारी विद्यालय के पास मां शारदा मंदिर स्थित है। यहां स्वर की देवी, ज्ञान की देवी, शिक्षा की देवी और आल्हा-ऊदल की आराध्य देवी मां शारदा विराजमान हैं। लोगों की श्रद्धा का यह प्रमुख केंद्र है। नवरात्रों में यहां भारी भीड़ उमड़ती है।
रविवार, 22 अक्टूबर 2017
एक विक्रेता की मौत उर्फ़ फेरीवाला मरिगा
बुधवार, 19 जुलाई 2017
सभागार
रीवा में अत्याधुनिक प्रेक्षागृह की आवश्यकता है
रविवार, 30 अप्रैल 2017
मज़दूर दिवस
कहते है वो
पसन्द आई तेरी सिपहसालारी।
यहाँ तो मुद्दतों से बस खटते आये है।
न हो यकीन तो?
घरों की दीवारों से पूंछ लो।
उस पर न मेरा हक़ है न तस्वीर....................….............
गुलाम का ख़त
बुधवार, 15 मार्च 2017
मण्डप के बारे में
मण्डप के बारे में
मण्डप सांस्कृतिक शिक्षा कला केंद्र संपूर्ण प्रदेश में सक्रिय संस्था है जो अपने विभिन्न सांस्कृतिक साहित्यिक कार्यो के द्वारा मिट्टी की सोंधी सुगंध को संरक्षित करने का कार्य कर रही है।
राष्ट्रीय,प्रादेशिक एवं संस्थानिक ज्वलंत समस्याओं के तथ्यपरक विवेचन जागरूकता और सांस्कृतिक शिक्षण - प्रशिक्षण के लिए रीवा में किया| रीवा और रीवा के आसपास के क्षेत्र में रंगकर्म के बीज बहुत अधिक संख्या में बिखरे हुए थे ये बीज अपने आस –पास के वातावरण से प्राप्त हवा और नमी से प्रस्फुटित तो होते थे| परन्तु नमी के उड़ जाने के बाद ये कुम्हला और सूख जाते थे। इनके लिए ऐसा कोई बागीचा या क्यारी नहीं थी जहाँ पर इन्हें संरक्षित और सहेजा जा सके। देखरेख के लिए कोई माली भी नहीं था जो उनको सींचता और देखभाल कर उनको वृक्ष बनने के सुअवसर प्रदान करता। अपने आसपास के वातावरण और नमी से उपजे इन्ही पौधों को संरक्षित करने सहेजन सुरक्षा देने और उन्हें बेहतर बनाने के लिए मण्डप का निर्माण किया गया|
1984 के दौर में जब भोपाल में भारत भवन में रंगमंडल की स्थापना हुई और वहां होनेवाले उत्कृष्ट रंगकर्म की धमक रीवा भी पहुँची |इस चमक और धमक में 2000 के आस पास में तेजी आई| बहुत सारे लोग रंगकर्म की चाहत और नए प्रयोग करने की चाह लिए रीवा से बाहर गए| एक दशक बाद लौटकर उन्होंने यहाँ पौध को सहेजने और मंच देने का काम किया | आज यह काम निरंतर जारी है और दिनों दिन फल-फूल रहा है|
लगभग 2004 से “मण्डप सांस्कृतिक शिक्षा कला केंद्र” द्वारा नुक्कड़ नाटकों का सिलसिला शुरू हुआ। मण्डप द्वारा मंचित होने वाले नाटकों की गूँज न केवल रीवा,मध्यप्रदेश के शहरों के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों में भी पहुंची है। मण्डप द्वारा मंचित नाटकों में हवालात ,राम की शक्ति पूजा, अमर शहीद ठाकुर रणमत सिंह,वोटिंग फॉर गोदो, बैरागिया नाला, महतारी, प्रेम दीवाने, राई, महापंडित केशव, अभिमन्यु की आत्महत्या, बड़े भाई साहेब, अन्धा युग , अंधेर नगरी , डाकघर, चोप कचहरी , समय केर फेर, एक विक्रेता की मौत, आदि की प्रस्तुतियां की है| मण्डप अब तक 30 से अधिक नाटकों का मंचन, प्रतिवर्ष 4 नाट्य समारोह और 4 नाट्य कार्यशालाए आयोजित करती है। नाटकों के प्रदर्शन देश के हर कोने में हुए और सराहे गए है।
“मण्डप सांस्कृतिक शिक्षा कला केंद्र” प्रति वर्ष दो-तीन नए नाटकों का मंचन करती है| इसके अलावा मण्डप द्वारा लोक कलाओं के संरक्षण , संवर्धन, प्रदर्शन की दिशा में कारगर कम किया है| जनहित से जुड़े सभी सरोकारों से भी हमारा वास्ता है साक्षरता, भूकंप,पर्यावरण, बाढ़, प्राकृतिक आपदा चुनाव व अन्य मसलों पर हमारी टीम ने अपनी भूमिका पूरी ईमानदारी से निभाई| हमारे सार्थक रंगकर्म को स्थानीय दर्शकों का भारी संबल मिला और उन्हीं के सहारे आज हम खुद को स्थापित कर पाए।
मण्डप आर्ट अपनी त्रैमासिक पत्रिका भी निकलने को संकल्पित है।
सोमवार, 30 जनवरी 2017
हलाल
अड़ियल थे जडियल भी
औ गलियां रोज बनाते थे
हमीं को कर दिया हलाल
आखिर क़ाबिल जो थे।
आप थे हम भी थे
समय भी वही था
यहाँ वहां जहाँ जो भी
था सिर्फ गवाह वो
बुधवार, 18 जनवरी 2017
बांसनि कन्या
बांसनि कन्या
सात भाइयों की एक बहन थी जिसका नाम सुंदरी था| माता पिता नहीं थे| परिवार बहुत गरीब था बहन सुंदरी घर का काम करती थी भोजन बनती थी लीपना पोतना भी उसी के जिम्मेदारी थी| खेत पर भाइयों के लिए भोजन लेकर जाती और प्रेमभाव से उन्हें खिलाती थी| एक दिन सतवन भाई (छोटा भाई) ने लालभाजी खाने की इच्छा जताई| सतवन भाई के नेहवश सुंदरिया कोलिया (घर के पास का खेत) से लाल भाजी खोंटकर (तोड़कर) लाती है| साफ पानी में धोकर लालभाजी को हंसिया से छोटे-छोटे टुकडे में काटती है उसे काटते समय उसकी हथेली में हंसिया लग जाती है| चोंट पर सुंदरिया का ध्यान नहीं जाता है| भाजी पकाने के लिए जब छोड़ती है और हाँथ धोती है तब पता चलता है कि उसकी हथेली कट गई है और उसका खून लालभाजी में पक गया है| सुंदरिया भाजी को फेंकना चाहती है और उधर दुपहरिया हो गई है| भाइयों के पास भोजन पहुँचाने का समय हो जाता है| सुंदरी वही भाजी लेकर खेत पर जाती है| और अपने भाइयों को भोजन परोसती है| भोजन करते-करते बड़ा भाई कहता है कि आज भाजी में क्या मसाला डाला है भाजी तो बहुत ही स्वादिस्ट है| सुंदरिया कहती है कि रोज की तरह ही बनाई है| बड़ा भाई ऊँची आवाज़ में बोलता है सुंदरी बता क्या है इस भाजी में| डरकर सुंदरी बताती है आज जब भाजी काट रही थी तब मेरी हथेली कट गई थी तो हाँथ खून निकला था वो उसी भाजी में मिल गया| सुंदरिया सुबुकते हुए बोली| भाजी में और कुछ नया नहीं है| सुन्दरी भाइयों को भोजन करावाकर घर चली जाती है| भाई खेतों में काम करना शुरू कर देते है| पर काम करने की गति धीमी हो जाती है| घर लौटते समय बड़ा भाई कहता है कि आज के भोजन में सुंदरी के खून मिलने से भाजी स्वादिस्ट हो गई थी| कुछ देर की चुप्पी के बाद बोलते है| सुंदरिया का खून जब इतना मीठा है तो उसका मांस कितना मीठा होगा| छोटे भाई सतवन को छोड़ सब भाई कहते हैं सही कह रहे हो दादा| और सतवन कहता है दादा आप बहुत निर्दयी है| बड़े भाई डांटते है| अगली सुबह खेत जाने से पहले सातों भाई अपना-अपना धनुष बाण लेकर जाते है जब दोपहर में सुंदरिया भोजन लेकर आती है तब बड़ा भाई उसे सेमर के पेंड पर चढने के लिए कहता है| सुंदरिया पूंछती है क्यों? बड़ा भाई कहता है सेमर के ऊपर चढ़कर तुम नज़र रखों कि कोई आदमखोर जानवर तो नहीं दिख रहा है| सुंदरिया तुरंत सेमर के पेड़ पर चढ़ जाती है| और चारों तरफ देखती है| तब तक छोटे भाई को छोड़ सब भाई तीर अपने-अपने धनुष पर चढ़ा लेते है| सुंदरिया कहती है भैया यहाँ कोई आदमखोर नहीं है| इतना कहते ही बड़ा भाई तीर छोड़ देता है| जो सुंदरी को नहीं लगता है फिर बारी बारी से छोटे भाई को छोड़ सब बहन सुंदरिया पर अपने बाण से निशाना साधते है पर सुंदरिया हर बाण से बच जाती है| छहों भाइयों के बाण समाप्त हो जाते है| तब बड़ा भाई सतवन को कहता है तुम सुंदरी पर निशाना लगाओ| मै नहीं लगाऊँगा सतवन कहता है| मै सुंदरिया से स्नेह करता हूँ| बड़ा भाई कहता है तू भी मरेगा, चल सुंदरिया पर निशाना लगा, मार| सारे भाई लगातार सतवन पर बाण साधने और सुंदरिया को मार गिराने का दबाव बनाते है| दबाव में आकर सतावन अपना बाण सुंदरिया की विपरीत दिशा में छोड़ता है लेकिन बाण घूमकर सुंदरिया को लग जाता है| सुंदरिया ज़मीन पर गिर जाती है| सतवन विलाप करता है मेरे हाँथों से प्यारी सुंदरिया को मरवा दिया| भईया तुम लोग बहुत निर्दयी हो| अच्छा बहुत निर्दयी है यही बोला था तूने | सुंदरिय को तुमने मार दिया है| फिर बोला निर्दयी कैसा होता है हम बताते हैं| अब तुम ही सुंदरिया के मांस को काटोगे, भूनोगे और मांस भात बनाओगे नहीं तो हम तुम्हें भी मार देंगे| सतवन तुम इन सात पहाड़ों को पार करके लकड़ियों का गट्ठर लाओ और ध्यान रखो कि गट्ठर को बिना गाँठ बांधे लाना है| सतवन सात पहाड़ों को पारकर एक जगह रुकता है लकडियाँ इकठ्ठा करके बिना बांधे सर पर रखता है पर लकडियाँ गिर जाती है| सतवन रोता है तो सात बहिनिया सांप आतीं है सतवन से पूंछती है क्या हुआ मनसुतिया| सतवन पूरा सच-सच बता देता है| सात बहिनियाँ आपस में सलाह कर उसे मदद करती है| कहती है कि तुम गट्ठर को अच्छे से बनाओं हम सब मिलकर गट्ठर को बाँध लेते है और भाइयों के पास पहुँचाने के बाद तुम गट्ठर को आराम से ज़मीन पर रखना हम चुपचाप चले जाएंगे| सतवन वैसा ही करता है| सतवन सातों बहिनिओं को धन्यवाद देता है| भाई जब देखते है कि लकड़ी आ गई तब सतवन को धान देकर भेजते है इस धान को बिना चक्की में डाले चावल बनाकर लाओ| सतवन जंगल जाता है और नरबा (बरसती नाला) के किनारे बैठकर रोता है| चिड़िया आतीं है पूंछती है क्यों रोते हो मनसुतीय? सतवन बेटा चिड़िया को बताता है| चकरी का इस्तेमाल किये बिना धान को चावल बनाना है| चिड़िया कहती है इसमें रोने किक्या बात है| सब चिड़ियाओं को धान फोकने (धान को मुह में रखती है और दबाकर धान कि भूसी और चावल को अलग कर देती है) को कहती है और सब मिलाकर धान को चावल में तब्दील कर देते है| सतवन चिड़िया को धन्यवाद देकर घर आता है| सतवन चावल लेकर भाइयों के पास आ जाता है| भाई चावल देखकर हैरान है| तब फिर एक मटका देता है और नदी से मटके में पानी भरकर लाने के लिए कहता है|| सतवन नदी जाता है मटके में पानी भरता है| तो पानी पूरा गिर जाता है| नदी के पाट पर बैठकर रोता है| पूरी कहानी नदी कहता है| मेढक राजा यह बात सुनाता है और सतवन से कहता है कोई बात नहीं हम छेद में चिपक जायेंगे जैसे-जैसे पानी कम होता जाएगा हम मटके से निकलकर नदी चले आएंगे| सतवन मेंढक राजा को उनको धन्यवाद देता है| बड़ा भाई कहता है| चल अब मांस और भात पका| सतवन मांस पकता है| चावल पकाता है| फिर बड़ा भाई कहता है| सतवन हम लोगों के कपडे बहुत गंदे हो गए है तुम इन कपड़ों को बिना साबुन और बिना पत्थर के साफ कर लाओ| गठरी भर कपडे लेकर नदी में जाता है| विलाप करता है| तब कछुआ कहता है मनसुतिया तू क्यों रो रहा है| मुझे अपनी समस्या बता मैं मदद करूंगा| यह बात वही पर बगुला भी मछली पर नज़र लगाये हुए सुनता है और कहता है हाँ मैं भी मदद कर दूंगा| सतवन बताता है कि मेरे बड़े भाइयों ने कहा है कपड़ों को बिना साबुन और पत्थर के साफ कर के लाना है| बगुला कहता है बस तू मेंरे पंख ओ छु-छूकर कपडे धोना साबुन कि जरूरत नहीं पड़ेगी| और कछुआ कहता है कि मेरी पीठ को पत्थर कि जगह कपडे पटकना| कपडे झक्क सफ़ेद हो जाते है| सतवन कपडे धोने के बाद रोने लगता है वहीँ नदी के पाट पर बैठ जाता है तब केकड़ा और झींगा मछली आती है| अब क्या हुआ पूछती है क्या हुआ? सतवन पूरी कहानी सुनाता है कि अब अगर मै घर जाऊँगा तो मुझे अपनी प्यारी बहन के मांस खाने के लिए कहेंगे तो मै क्या करूंगा| तुम्हारी समस्या हम ख़त्म करेंगे| झींगा कहती है कि जिस समय मांस खाने को कहेंगे तब मुझे खाना और केकड़ा कहता है कि जब हड्डी चबायेगे तब मुझे चबाना तो कोई शक नहीं करेगा| सतवन झींगा और केकड़े को मारता है घर आता है झींगा और केकड़े को पकाता है| कि चल अब मांस और भात को पका| सब को भोजन ककेर पान के पत्तलों में परोसों| सतवन वैसा ही करता है | बड़ा भाई कहता है कि तुम भी खाओगे| अपने पत्तल में झींगा और केकड़ा छुपाकर रख लेता है| बड़ा भाई सतवन को सुंदरिया का ह्रदय अलग से देता है जिसे सतवन एक पत्तल में छिपा देता है| जब सब भोजनकर सोने चले जाते है तब सतवन रात के अँधेरे में सुंदरिया का ह्रदय जंगल में गाड देता| कहता है मै तुम्हें तिलांजलि देता हूँ फिर बारिश का मौसम आता है तब वहां पर एक पौधा अंकुरित होता है| कुछ दिनों के बाद अहीर जो कि जंगल में अपनी गाय और भैंस चराने जाता है| उसे एक झाड़ी से गाना सुनाई देता है| उस पौधे की एक टहनी को काट लेता है| और उससे सुरीली बांसुरी बनाता है| बांसुरी सुरीली है| एक दिन बाँसुरी को बजता हुआ सतवन के घर के सामने से जाता है तब बांसुरी से अपनेआप स्वर निकलते है|
(गीत)
सात भैइयन के हम हन बहिनी, मार दिया मन मार|
घरबार सभारन, दौरिउ नाधन, करन चेरौरी, बहु बार||
एक सुधि आवे, जेवना बनत के, भईया भईया कही हम भईया|
कब देखि लेई सतवन भईया का, कलेवा हूँ लाई तोही नटे||
भईया तेने जुलुम कर डाला, हमको दिया कपट से मार|
धोखे से मोही मार लिया, आसा पे पानी फेर दिया||
इक जननी ने जाया हमको, ई दुनिया मा कोन हमार|
इन नैनन को प्यारे थे, भैइया, लोगे कब सुधि हमार||
अहीर बांसुरी को डरकर फेंक देता है| उसे सतावन उठाकर अपने ह्रदय से लगा लेता है और घर में सुरक्षित रखा लेता है| भाइयों के साथ खेत में काम करने जाता है बांसुरी से सुंदरिया निकलती है और घर का काम कराती है और भोजन भी पका देती है| दोपहर सब भाई घर आते है| तो देखकर दंग रह जाते है आज तो सतावन ने ठीक किया कि सुबह ही भोजन बना लिया| सतवन डर से कुछ नहीं बोला| सब ने खाना खाया तो भोजन गरम था ऐसा ही कई दिनों तक चलता रहा सतावन को बहन सुंदरिया के हांथों के बनाये भोजन का स्वाद मिलता है| एक दिन सतावन बीमारी का बहाना बनता है| और खेत नहीं जाता है पैरा के पीछे छुपकर देखता है घर का काम कौन करता है| तो देखता है कि बांसुरी से बहन सुंदरिया निकलती है और झाड़ू लगाति है उसी समय सुंदरिया की नज़र सतवन से मिल जाती है और सुंदरिया मुक्त हो जाती है अब मै कन्या के रूप में नहीं रह पाऊँगी| मुझे बांस ही बनना पड़ेगा| मुझे लोग बांसनि नाम से जानेगें|सतवन खूब रोता है| मैंने तुझे मारा है सुंदरिया कहती है यह सब तो नियति है| यह तो होना ही था उपक्रम तुम बने| सतवन को आशीष दे जाती है लोग मुझे अपने घर से जितनी बार मारकर, काटकर बाहर निकालेगे पर मैं नहीं जाउंगी किसी न किसी रूप में तुम्हारे जीवन में रहूंगी| तुम्हारे सोलह संस्कार मेरे बिना संभव नहीं है| और तब से ही लड़की के जन्म में बांस के सूप में रखा जाता है विवाह में बांस का ही सब सामान दिया जाता है और जब इन्सान मरता है तब भी टिकठी भी बाँस की ही होती है|
जादू बरहक कोई नहीं जाने, करनी का फल तू पावेगा|
जंतर कोई ताल बजावे, नहिं उजड़त इक बाल||
भाई बस में इस्तरह होता, काया दे मोहनी डार|
जलवा दूँ, जल में ही बांधू, बांधू निर्मल नीर|
सात समंदर कोट से बांधूं, बांधूं बावन बीर||
बांसनि के स्वर गूंजने लगते है लोग सुनते है| और सातवाँ को छोड़ बाकी छहों भाइयों का सर मुडाकर, दही लपेटकर गधे में बिठाकर गाँव से निकल देते है|
