रीवा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रीवा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 16 अक्टूबर 2022

श्रेष्ठ


श्रेष्ठ


सफलता के अनेक रंग, रूप, आकार, प्रकृति होती है और समय के साथ बदलती रहती है

सफलता के अलग अलग विभिन्न स्तर होते है एक दिन में प्राप्त नहीं होती है और सफलता जीवन की कुछ इच्छाओं की आहूतियाँ मांगती है। जिसे देना पड़ेगा। इसलिए स्वयं कोई सफल नहीं होता बल्कि अन्य लोगों की दृष्टि में सफल होता हैI सफलता के हमारे मानक अपने आगे के पायदान में खड़े व्यक्ति को ही देखता है।

बुधवार, 15 जून 2022

बनाने वाले के काम

हमने बनाया अजी हमने बनाया  
गोइठा बनाया, मिट्टी कि गाडी बनाया,
चिमटा बनाया, शेर बनाया, राजा बनाया है, झाड़ू बनाया, माला बनाया।
बैल बनाया है, गधा बनाया।
पेड़ बनाया,
नर बनाया भोली भाली नार बनाया|
रोटी बनाया, मिठाई बनाया।
फूल बनाया,
कबाड़ बनाया।
 बिल्ली बनाया, बन्दर बनाया
हवन बनाया।
ईगो मोटल्ली भैसीं बनाया, उसका ख़ूबसूरत चेहरा बनाया।
आरती कि थाल बनाया, अन्नपूर्णा देवी बनाया। मुरारी और श्याम बनाया ओखे संग कंस बनाया।
गाँव बनाया, हाट बाज़ार बनाया।
लालटेन बनाया कबहूँ कबहूँ गीत बनाया।
गैल बनाया रैल बनाया कबहूँ कबहूँ पुलिस बनाया।
गुण बनाया, अवगुण बनाया, सगुन बनाया असगुन बनाया.....

मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

रंगमंच के फायदे, रंगमंचीय पर्यटन

ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के क्रिसमस संस्करण में प्रकाशित किया गया है जो इन्सान प्रत्येक महीने में रंगमचीय प्रस्तुतियों को देखता है वह सामान्य से ज्यादा स्वस्थ रहता है| समान्य से ज्यादा सुकून में रहता है| रोगों और व्याधियों का खतरा कम होता, मन प्रफुल्लित और सकारत्मक उर्जा से भरा रहता है| रंगमंचीय प्रस्तुतियों में नाटक, नृत्य, गायन, वादन, जादू, सर्कस, पारिवारिक फिल्में आदि विधाओं को शामिल किया गया था| 

शोध में रंगमंचीय प्रस्तुतियों के साथ ही कला संग्रहालयों को भी शामिल किया गया है| इन संग्रहालयों में मनुष्य तस्वीरों को देखता है रंगों को देखता है| रेखाओं को देखता है| संरचना को देखता है भावों पर विचार करता है इससे दिमाग़ संतुलित होता है उसमें सोचने, समझने और समझाने की प्रवृत्ति भी उभरती है|

यूनिवर्सिटी कालेज लन्दन के शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि आप यदि लम्बी ज़िन्दगी जीना चाहते है| तो इसके लिए आपको महीने में एक बार सभागारों, संग्रहालयों, आर्ट गैलरियों, सिनेमाघरों में घूमने जाना चाहिए| शोधकर्ताओं ने 50 वर्ष से अधिक उम्र के लगभग 7000 वयस्क व्यक्तियों के सेहद पर लगातार 12 वर्ष तक यह शोध किया है| और पाया कि जो लोग रंगमंच की किसी भी विधा को लगातार देखते रहते है और उन्हें पसंद करते रहते है उन्हें देखने जाते रहते है| उनकी जल्दी मृत्यु के जोखिम में 31 प्रतिशत की कटौती हो जाती है| इस शोध में लन्दन के शोधकर्ताओं ने दावा किया गया है| कि हर महीने एक बार रंगमंच देखने से किसी भी व्यक्ति की जल्दी मौत होने का खतरा कम हो जाता है| शोधकर्ताओं ने पाया कि कला से जुड़े लोगों की मृत्यु की संभावना में 14 प्रतिशत की कमी थी| शोध में ऐसे साक्ष्य मिले है कि जो लोग कला से जुड़े रहे, चाहे वे तस्वीरों की तारीफ ही कर रहे है| परन्तु उनके स्वस्थ को लाभ पहुंचा है| शोधकर्ताओं ने कहा कि महीने में सिर्फ एक बार भी थियेटर जाने से व्यक्ति के मानसिक स्वस्थ में सुधार हो सकता है| और रंगमंच व्यक्ति के शारीरिक गतिविधियों को भी प्रोत्साहित कर सकती है| हालांकि मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक गतिविधियों को विशेष ध्यान में रखते हुए आर्ट गैलरी को लम्बी उम्र के साथ जोड़ कर शोध किया गया| शोध के लेखक डॉक्टर डेजी फैन्कोर्ट ने कहा की इस बात के लिए अभी और परीक्षण करने की जरूरत है कि रंगमंच में जाने से जल्दी होने वाली मौतों को कैसे रोका जा सकता है| डॉक्टर डेजी फैन्कोर्ट ने प्रतिभागियों को औसतन 12 वर्ष तक देखा और इस नतीजे तक पहुंची|

सोमवार, 11 मार्च 2019

मेरे मरने पर

मेरे मरने पर मत चराग़ जलाना।
रोशनी दिखानी है तो जीते जी आना।।

रखना है मन का सिकंदर बना रखो।
विभीषण बन, मत घात लगाना।।

आना तो चुपके से विचार की तरह।
चिल्लाते कुत्ते लोमड़ी और सियार है।।

मेरे हिस्से का सूरज संभालकर रखना।
तक़दीर में हमारे अँधेरा बहुत है।।

जाना ईश्वर की तरह, कि फिर लौट न पाना।
जान सा क्या जाना, जब है फिर यहीं आना।

सोमवार, 22 जनवरी 2018

बघासुर

बघासुर (लोकआख्यान)
उमरिया शहडोल डिंडोरी और उसके आसपास के क्षेत्र में बाघ देवता की कथा प्रचलित है कथा के मूल में जंगल के राजा बाघ (शेर) हैं। कथा का रूप समयानुसार रूप बदल रहा है या यूं काहे कहे की ज्यादा प्रभावशील बन पड़ा है। कथा में आदिशक्ति के बाल रूप की चर्चा है। कथा देवी वैष्णव की कथा से मिलती है। उक्त कथा में पूरा प्रसंग वैष्णव देवी का और भैरव की सत्ता को जड़ से उखाड़ने की है साथ ही आम जन के मन उत्पन्न भैरव के भय को उनके मन में मारने का रूप प्रस्तुत करते है। कथा में गीत है किहनी कहनूत उक्खान और पहेलिया बहुतायत में है।
मूल कथा तो तकरीबन सभी स्थानों पर एक सी ही है। पर सुनते समय कथा को सुनाने से होनेवाले मनोरंजन का प्रभाव हमेशा ही अलग होता रहता है

रविवार, 26 नवंबर 2017

रीवा में आराध्य देवी शक्तिपीठ

आराध्य देवियाँ रीवा जिला

दक्षिण में बालाजी, उत्तर में मां वैष्णो देवी। विंध्य में मां शारदा और विंध्यवासिनी। पश्चिम में पुष्कर तो पूर्व में बंगाल की मां काली। हर तीर्थ और मंदिर का अपना इतिहास है, लेकिन बात रीवा रियासत की करें तो यह देश का इकलौता स्थान है, जहां नौ देवियां सैकड़ों साल से अपनी कृपा बरसा रही हैं। बघेल राजाओं द्वारा नौ देवियों को स्थापित करने का उद्देश्य दुश्मनों की बुरी नजर से बचना, रियासत में सुख-शांति था। पेश है रिपोर्ट...।

मां कालका मंदिर: रानी तालाब में रीवा शहर का सबसे चर्चित मंदिर है। यहां पर मां कालका विराजमान हैं। नवरात्र में हजारों भक्त माथा टेकते हैं। कहते हैं मन की भावनाओं को भांप कर मां प्रसन्न हो जाती हैं। यहां सिद्धि के लिए बलि भी दी जाती है। मां की प्रतिमा 450 वर्ष पूर्व एक व्यापारी दल ने यहां छोड़ दी थी। रीवा रियासत के राजाओं ने इस स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया। ऐसी किदवंती है। वर्तमान में यहां भव्य मंदिर है।

महिषासुर मर्दनी
राजवंश की देवी के रूप में महिषासुर मर्दनी की स्थापना रीवा किले के जगन्नाथ परिसर में की गई थी। तब से इनकी पूजा-अर्चना होती आ रही है। नवरात्र के दिनों में यहां पर भक्तों की आस्था देखते ही बनती है। महामृत्युंजय भगवान के साथ महिषासुर मर्दनी के दर्शन सौभाग्यशाली होते हैं।

मां उग्रतारा देवी
रीवा किले के बाहर उपरहटी में बंगाली टोला में मां उग्रतारा देवी का मंदिर स्थित है। कहते हैं भगवान शंकर को मां उग्रतारा देवी ने ही दूध पिलाया था। मां उग्रतारा से ही भगवान शंकर को तीसरा नेत्र प्राप्त हुआ था। नवरात्र में मां के दरबार में भक्तों का डेरा लगता है।

कौमारी माता
रीवा किले के पूर्वी हिस्से के अखाड़घाट में स्थित कौमारी माता का मंदिर है। आस्था का यह केंद्र है। कहते हैं कि जिन कन्याओं का विवाह नहीं होता है। यहां पूजन के बाद उनका विवाह जल्द होने की संभावना रहती है। इसी आकांक्षा में मां के दरबार में युवतियां माथा टेकने आती हैं।

मां फूलमती देवी
रीवा शहर में समान तिराहे से बाण सागर कालोनी आते समय नए बस स्टैंड के पीछे मां फूलमती देवी का मंदिर है। जिन्हें रीवा राज्य के राजाओं द्वारा स्थापित किया गया था। फूलमती देवी जिन्हें वन देवी के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्र में इनकी पूजा-अर्चना फलदायी होती है।

मां जालपा देवी
उपरहटी में किले के बाहर मां जालपा देवी की प्रतिमा स्थापित है। किले से 150 मीटर की दूरी पर रीवा रियासत के राजाओं ने इस मंदिर की नींव रखी थी। यह देवी मंदिर अखंड ज्योति का प्रतीक है। इन्हें ज्वाला देवी का स्वरूप माना जाता है।

मां शीतला माता
अमहिया मोहल्ले के रास्ते पर स्थित मजार के पास नीम के पेड़ के नीचे मां शीतला माता का मंदिर स्थापित है। यह देवी आपदा, महामारी से तो बचाती ही हैं, बच्चों की रक्षा के लिए जानी जाती हैं। जहां माताएं शीतला अष्टमी को चूड़ी मिष्टान चढ़ाती हैं।

मां विंध्यवासिनी देवी
रीवा शहर के तरहटी मोहल्ले में नगरिया स्कूल के आगे स्थित मां का मंदिर हर दिन आस्था का केंद्र है। कहते हैं पृथ्वी की उत्पत्ति से ही विंध्य पर्वत का उदय हुआ था। माता देवकी के कारण से जन्मी और मामा कंस के हाथों से पटकी गई देवी ही मां विध्यवासिनी हैं।

मां शारदा मंदिर
रीवा में फोर्ट रोड स्थित सुदर्शन कुमारी विद्यालय के पास मां शारदा मंदिर स्थित है। यहां स्वर की देवी, ज्ञान की देवी, शिक्षा की देवी और आल्हा-ऊदल की आराध्य देवी मां शारदा विराजमान हैं। लोगों की श्रद्धा का यह प्रमुख केंद्र है। नवरात्रों में यहां भारी भीड़ उमड़ती है।

रविवार, 22 अक्टूबर 2017

राष्ट्रीय रंग अलख नाट्योत्सव 2014

 
राष्ट्रीय रंग अलख नाट्योत्सव की उन्नति लिखित विवरण
मण्डप सांस्कृतिक शिक्षा कला केंद्र, रीवा का प्रतिष्ठा आयोजन|

विन्ध्य में रंगमंच की अपनी सुदीर्घ परंपरा है| विन्ध्य प्रदेश की राजधानी रही रीवा| जहाँ वर्ष 1903 में विन्ध्य प्रदेश के महाराजा विश्वनाथ सिंह जू देव के समय में सैनिक रंगमंडल रंगमंच कर रहा था उन 15 वर्षों में 21 नाटकों का मंचन किया गया साथ ही पृथ्वीराज कपूर साहब ने रीवा में अपने नाटको का मंचन किया था| इसी परंपरा का निर्वाहन मण्डप पिछले 10 वर्षो से अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से कर रहा है संस्था के नाटको में मनुष्य के अस्तित्व उसके दर्शन एवं मानवीय संवेदनाओं को सहजता एवं दृढ़ता पूर्वक प्रस्तुति को नया कलेवर प्रदान करना है| इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर हमने प्रथम राष्ट्रीय रंग अलख नाट्योत्सव की परिकल्पना की|
मण्डप सांस्कृतिक शिक्षा कला केंद्र के लिए नाटक करना शौक नहीं बल्कि अभियानहै| रीवा में मण्डप सांस्कृतिक शिक्षा कला केंद्र ने रंगमंच के क्षेत्र में ज्यादा स्थान घेरा है| प्रथम राष्ट्रीय रंग अलख नाट्योत्सव की व्यवस्था सुचारूरूप से हो सके इसके लिए सर्वप्रथम नाट्योत्सव समिति का निर्माण किया गया जिसमें संरक्षक डॉ. दिनेश कुशवाहा (साहित्यकार), श्री जयराम शुक्ला (वरिष्ठ पत्रकार), श्री देवेन्द्र सिंह (चेयरमैन, महाराजा ग्रुप) डॉ. चन्द्रिका प्रसाद चन्द्रनिश्चित हुए एवं अध्यक्ष-श्री अशोक सिंह, उपाध्यक्ष-चंदू खुशलानी, कोषाध्यक्ष-विजय विश्वकर्मा, सचिव-विनोद कुमार मिश्रा, सहसचिव-राज तिवारी भोला, संयोजक-के.सुधीर, एवं विशेष मार्गदर्शन मनोज कुमार मिश्रा (भारतेन्दु नाट्य अकादेमी) एवं योगेश त्रिपाठी(साहित्यकार) को तय किया गया| 

रीवा देश का ऐसा शहर है जिसमें सभागार नहीं है परन्तु संस्कृति विभाग, भारत सरकार के सहयोग से आयोजित प्रथम राष्ट्रीय रंग अलख नाट्योत्सव का शुभारम्भ 20 दिसंबर को शाम 6:30 बजे मध्यप्रदेश शासन के खनिज, जनसंपर्क एवं उर्जा मंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल ने स्वयंबर विवाहघर में नगाडे को ध्वनित एवं दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया|
प्रथम 05 दिवसीय राष्ट्रीय रंग अलख नाट्योत्सव में भारतीय बोलियों के रंगमंच को बढ़ावा दिया गया नाट्योत्सव में लोककलाओं के समावेष के साथ ही बोलियों के रंगमंच में हो रहे नए प्रयोग को भी महत्त्व दिया गया है| प्रथम राष्ट्रीय रंग अलख नाट्योत्सव के पहले दिन 20 दिसंबर को नाटक-छाहुरमंचित हुआ जिसका निर्देशन किया था छाहुर गुरू आनन्द मिश्रा ने| छाहुर नाटक बघेली लोककथा पर आधारित बघेली बोलीमें है| नाटक का प्रमुख पत्र छाहुर है और उसके इर्दगिर्द ही कथा का प्रसार है| नाटक में दासों के द्वारा ज़मींदारों के खिलाफ उठ खड़े होने को मूर्त किया गया है| दूसरे दिन 21 दिसंबर को मौसा जी जयहिन्द का मंचन वसंत काशीकर के निर्देशन में विवेचना जबलपुर की प्रस्तुति हुई| यह प्रस्तुति बुन्देली बोलीऔर परिवेश में की गयी| नाटक उदयप्रकाश की कहानी मौसा जी पर आधारित थी| मौसा जी किस्सा सुनाते है| उन्होंने अपने आसपास एक झूठा संसार स्थापित कर लिया है जैसा की आजकल तकरीबन सबने ही कर रखा है| परन्तु समाज उन्हें यथार्थ से परिचय करा ही देता है| तीसरी शाम 22 दिसंबर को थैंक्यू बाबा लोचनदास का मंचन बुन्देली बोली में रंगदूत सीधी के द्वारा प्रसन्न सोनी के निर्देशन में हुआ| नाग बोडस के नाटक में नर-नारी संबंधों की पेचीदगी को समझने का प्रयास उलझन ही बढाती गयी, नाग बोडस का बहुत ही प्रसिद्ध नाटक है| प्रसन्न सोनी को संस्कृति विभाग, भारत सरकार के द्वारा जूनियर फेलोशिप के अंतर्गत बघेलखंड की


लोककथाओं पर शोध कार्य के लिए मिली है| 23 दिसंबर को राष्ट्रीय रंग अलख नाट्योत्सव की चौथी शाम मण्डप सांस्कृतिक शिक्षा कला केंद्र की प्रस्तुति धोखाका मंचन हुआ| प्रस्तुति धोखा नाटक अल्बेयर कामू के प्रसिद्ध नाटक द मिस अंडरस्टैंडिंगका बघेली बोलिबानी में रूपांतरण है| नाटक मनुष्य के असंतुष्टि के मुहावरे को चरित्रार्थ करता है| नाटक का निर्देशन मनोज कुमार मिश्रा (भा.ना..) का था| 24 दिसंबर को नाट्योत्सव का समापन राही मासूम राजा कृत उपन्यास टोपी शुक्ला से हुआ जिसका निर्देशन अनिल रंजन भौमिक ने किया था और प्रस्तुति थी सामानांतर इलाहबाद(.प्र.) की| नाटक एक इंसान के विशुद्ध हिन्दुस्तानी होने की कहानी है| टोपी शुक्ला जातिवादी लोगो से समझौता नहीं कर पता और समाज के बुद्धिजीवियों के सामने प्रश्न खड़ा करता है|
प्रथम राष्ट्रीय रंग अलख नाट्योत्सव, रीवा (.प्र.) के रंग प्रेमियों के लिए वरदान साबित हुआ है रीवा रंगप्रेमियों के लिए पहलीबार एक ही मंच पर पांच दिन लगातार शाम 6:30 बजे थर्ड बेल के साथ नाटकों का मंचन शुरू हो जाता था| एक साथ पांच निर्देशकों का कार्य देखना दर्शकों के लिए अभूतपूर्व अनुभव रहा| साथ ही नाटकों का तुलनात्मक अध्ययन भी दर्शकों के बीच हुआ| मंचन के बाद अगले दिवस सुबह पूर्वसंध्या में मंचित हो चुके नाटक पर परिचर्चा सत्र रहता था जिसमे दर्शकों, बुद्धिजीवियों, नाट्यनिर्देशक एवं नाट्य समूह के कलाकार शामिल होते थे और प्रस्तुत हो चुके नाटक की शैली, प्रकार, कथावस्तु, वेशभूषा, संगीत, एवं नाटक में निर्देशक और अभिनेताओं के अभिनव प्रयोगों पर विस्तार से चर्चा होती थी| जिसमे इसमें संस्था की तरफ से हनुमंत किशोर, विनय अम्बर , जयराम शुक्ल, चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र’, हिरेन्द्र सिंह, योगेश त्रिपाठी, चंद्रशेखर पाण्डेय आदि प्रमुख वक्ता के रूप में होते थे|

नाट्योत्सव कार्यक्रम के साथ ही पेंटिंग एवं स्कल्पचर प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया| जिसमें डॉ प्रणय, विनय अम्बर, के.सुधीर, अर्चना शैलेन्द्र, अपने चित्रों और स्कल्पचर के साथ उपस्थित हुए| दर्शकों के लिए यह अभूतपूर्व अनुभव रहा है| रीवा में पेंटिंग और स्कल्पचर की यह पहली प्रदर्शनी है| प्रदर्शनी के अवलोकन के लिए स्कूल एवं कालेजों के छात्रो को भेजा गया|
रीवा में संस्कृति विभाग, भारत सरकार के सांस्कृतिक कार्य अनुदान के सहयोग से प्रस्तुत मण्डप सांस्कृतिक शिक्षा कला केंद्र, रीवा के प्रतिष्ठा आयोजन की गूँज चतुर्दिक है| आपके सहयोग के बिना यह पुष्प रीवा में नहीं फूल सकता था| संस्कृति विभाग, भारत सरकार  ने रीवा में रंगोत्सव को आर्थिक सहयोग प्रदान कर मण्डप सांस्कृतिक शिक्षा कला केंद्र, रीवा में देश की प्रसिद्ध नाट्य कृतियों की उत्कृष्ठ, कलात्मक एवं नवोन्मेष कार्यो को देखने का अवसर प्रदान किया| आपके सहयोग से हीसभागार के आभाव में भी रीवा में नाटकों के नियमित दर्शक है|
मण्डप सांस्कृतिक शिक्षा कला केंद्र, रीवा (.प्र.) आपकी आभारी है कि संस्कृति विभाग, भारत सरकार हमें वित्तीय सहायता प्रदान कर प्रथम राष्ट्रीय रंग अलख नाट्योत्सव को सफल बनाया|

धन्यवाद