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बुधवार, 25 सितंबर 2019

ऐसी आँख

ऐसी आँख कहाँ से दूँ
जो दृश्य नहीं उसका  सत्य दिखाए।
ऐसा कान कहाँ से दूँ
जो शब्द नहीं अर्थ सुनाए।
ऐसा मुँख कहाँ से दूँ
जो व्यर्थ न बोले कभी।
ऐसा हाथ कहाँ से दूँ
जो दूसरे की ज़रूरत समझ सके।
ऐसा सिर कहाँ से दूँ
जो झुका ही रहे सदा।
ऐसा कर्म कहाँ से दूँ
जो याद रहे सदा

(कुछ नहीं रखा है इसमें)
मनोज कुमार मिश्रा

बुधवार, 14 नवंबर 2018

रीत प्रीत की

हुनर मक्कारी का क्या खूब सीखा है।
नाम याद रखते हो काम भूल जाते हो।।

प्रिय हो, प्रियतम हो, प्रेयसी हो।
रंग हो, रंगकर्म हो, रंगमंच हो।।

खैर तुम अपने हो, वो अब नज़दीक नहीं दिल के।
रैन गई, रीत गयी, प्रीत भई, सीख भई।।