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बुधवार, 25 सितंबर 2019

ऐसी आँख

ऐसी आँख कहाँ से दूँ
जो दृश्य नहीं उसका  सत्य दिखाए।
ऐसा कान कहाँ से दूँ
जो शब्द नहीं अर्थ सुनाए।
ऐसा मुँख कहाँ से दूँ
जो व्यर्थ न बोले कभी।
ऐसा हाथ कहाँ से दूँ
जो दूसरे की ज़रूरत समझ सके।
ऐसा सिर कहाँ से दूँ
जो झुका ही रहे सदा।
ऐसा कर्म कहाँ से दूँ
जो याद रहे सदा

(कुछ नहीं रखा है इसमें)
मनोज कुमार मिश्रा

गुरुवार, 22 नवंबर 2018

बाजारू रौनक

बाज़ार में रौनक
सोना बिक रहा है इधर
है बिक रही ककड़ी
गद्दा उस तरफ़ बेचा जाता है
यहाँ मिलता है जूता
वहाँ भोजन ले सकते है
उस गली में गोल गप्पे
ये गेहूँ-चावल की छल्लियाँ लगी
टपरे पर पान मिलेगा
कोने के ठेले पर चाय ले लो
इधर कहीं बिकता है पानी
अपने से नहीं आया
उतारा है इसे
उत्तर से दक्षिण उधर पूरब से पश्चिम
हमें खरीदना और बेचना आता है
बाज़ार बिमा कोई हैसियत नहीं हमारी

क्या हम बाज़ारू...?  है हम बाज़ारू।