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गुरुवार, 9 जनवरी 2020

नाटक देखने के फ़ायदे

ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के क्रिसमस संस्करण में प्रकाशित किया गया है जो
इन्सान प्रत्येक महीने में रंगमचीय प्रस्तुतियों को देखता है वह सामान्य
से ज्यादा स्वस्थ रहता है| समान्य से ज्यादा सुकून में रहता है| रोगों और
व्याधियों का खतरा कम होता, मन प्रफुल्लित और सकारत्मक उर्जा से भरा रहता
है| रंगमंचीय प्रस्तुतियों में नाटक, नृत्य, गायन, वादन, जादू, सर्कस,
पारिवारिक फिल्में आदि विधाओं को शामिल किया गया था|
शोध में रंगमंचीय प्रस्तुतियों के साथ ही कला संग्रहालयों को भी शामिल
किया गया है| इन संग्रहालयों में मनुष्य तस्वीरों को देखता है रंगों को
देखता है| रेखाओं को देखता है| संरचना को देखता है भावों पर विचार करता
है इससे दिमाग़ संतुलित होता है उसमें सोचने, समझने और समझाने की
प्रवृत्ति भी उभरती है|
यूनिवर्सिटी कालेज लन्दन के शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि आप यदि लम्बी
ज़िन्दगी जीना चाहते है| तो इसके लिए आपको महीने में एक बार सभागारों,
संग्रहालयों, आर्ट गैलरियों, सिनेमाघरों में घूमने जाना चाहिए|
शोधकर्ताओं ने 50 वर्ष से अधिक उम्र के लगभग 7000 वयस्क व्यक्तियों के
सेहद पर लगातार 12 वर्ष तक यह शोध किया है| और पाया कि जो लोग रंगमंच की
किसी भी विधा को लगातार देखते रहते है और उन्हें पसंद करते रहते है
उन्हें देखने जाते रहते है| उनकी जल्दी मृत्यु के जोखिम में 31 प्रतिशत
की कटौती हो जाती है| इस शोध में लन्दन के शोधकर्ताओं ने दावा किया गया
है| कि हर महीने एक बार रंगमंच देखने से किसी भी व्यक्ति की जल्दी मौत
होने का खतरा कम हो जाता है| शोधकर्ताओं ने पाया कि कला से जुड़े लोगों की
मृत्यु की संभावना में 14 प्रतिशत की कमी थी| शोध में ऐसे साक्ष्य मिले
है कि जो लोग कला से जुड़े रहे, चाहे वे तस्वीरों की तारीफ ही कर रहे है|
परन्तु उनके स्वस्थ को लाभ पहुंचा है| शोधकर्ताओं ने कहा कि महीने में
सिर्फ एक बार भी थियेटर जाने से व्यक्ति के मानसिक स्वस्थ में सुधार हो
सकता है| और रंगमंच व्यक्ति के शारीरिक गतिविधियों को भी प्रोत्साहित कर
सकती है| हालांकि मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक गतिविधियों को विशेष ध्यान
में रखते हुए आर्ट गैलरी को लम्बी उम्र के साथ जोड़ कर शोध किया गया| शोध
के लेखक डॉक्टर डेजी फैन्कोर्ट ने कहा की इस बात के लिए अभी और परीक्षण
करने की जरूरत है कि रंगमंच में जाने से जल्दी होने वाली मौतों को कैसे
रोका जा सकता है| डॉक्टर डेजी फैन्कोर्ट ने प्रतिभागियों को औसतन 12 वर्ष तक देखा और इस नतीजे तक पहुंची|

बुधवार, 15 मार्च 2017

मण्डप के बारे में

मण्डप के बारे में
मण्डप सांस्कृतिक शिक्षा कला केंद्र संपूर्ण प्रदेश में सक्रिय संस्था है जो अपने विभिन्न सांस्कृतिक साहित्यिक कार्यो के द्वारा मिट्टी की सोंधी सुगंध को संरक्षित करने का कार्य कर रही है।
राष्ट्रीय,प्रादेशिक एवं संस्थानिक ज्वलंत समस्याओं के तथ्यपरक विवेचन जागरूकता और सांस्कृतिक शिक्षण - प्रशिक्षण के लिए रीवा में किया| रीवा और रीवा के आसपास के क्षेत्र में रंगकर्म के बीज बहुत अधिक संख्या में बिखरे हुए थे ये बीज अपने आस –पास के वातावरण से प्राप्त हवा और नमी से प्रस्फुटित तो होते थे| परन्तु नमी के उड़ जाने के बाद ये कुम्हला और सूख जाते थे। इनके लिए ऐसा कोई बागीचा या क्यारी नहीं थी जहाँ पर इन्हें संरक्षित और सहेजा जा सके। देखरेख के लिए कोई माली भी नहीं था जो उनको सींचता और देखभाल कर उनको वृक्ष बनने के सुअवसर प्रदान करता। अपने आसपास के वातावरण और नमी से उपजे इन्ही पौधों को संरक्षित करने सहेजन सुरक्षा देने और उन्हें बेहतर बनाने के लिए मण्डप का निर्माण किया गया|
1984 के दौर में जब भोपाल में भारत भवन में रंगमंडल की स्थापना हुई और वहां होनेवाले उत्कृष्ट रंगकर्म की धमक रीवा भी पहुँची |इस चमक और धमक में 2000 के आस पास में तेजी आई| बहुत सारे लोग रंगकर्म की चाहत और नए प्रयोग करने की चाह लिए रीवा से बाहर गए| एक दशक बाद लौटकर उन्होंने यहाँ पौध को सहेजने और मंच देने का काम किया | आज यह काम निरंतर जारी है और दिनों दिन फल-फूल रहा है|
लगभग 2004 से “मण्डप सांस्कृतिक शिक्षा कला केंद्र” द्वारा नुक्कड़ नाटकों का सिलसिला शुरू हुआ। मण्डप द्वारा मंचित होने वाले नाटकों की गूँज न केवल रीवा,मध्यप्रदेश के शहरों के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों में भी पहुंची है। मण्डप द्वारा मंचित नाटकों में हवालात ,राम की शक्ति पूजा, अमर शहीद ठाकुर रणमत सिंह,वोटिंग फॉर गोदो, बैरागिया नाला, महतारी, प्रेम दीवाने, राई, महापंडित केशव, अभिमन्यु की आत्महत्या, बड़े भाई साहेब, अन्धा युग , अंधेर नगरी , डाकघर, चोप कचहरी , समय केर फेर, एक विक्रेता की मौत, आदि की प्रस्तुतियां की है| मण्डप अब तक 30 से अधिक नाटकों का मंचन, प्रतिवर्ष 4 नाट्य समारोह और 4 नाट्य कार्यशालाए आयोजित करती है। नाटकों के प्रदर्शन देश के हर कोने में हुए और सराहे गए है।

“मण्डप सांस्कृतिक शिक्षा कला केंद्र” प्रति वर्ष दो-तीन नए नाटकों का मंचन करती है| इसके अलावा मण्डप द्वारा लोक कलाओं के संरक्षण , संवर्धन, प्रदर्शन की दिशा में कारगर कम किया है| जनहित से जुड़े सभी सरोकारों से भी हमारा वास्ता है साक्षरता, भूकंप,पर्यावरण, बाढ़, प्राकृतिक आपदा चुनाव व अन्य मसलों पर हमारी टीम ने अपनी भूमिका पूरी ईमानदारी से निभाई| हमारे सार्थक रंगकर्म को स्थानीय दर्शकों का भारी संबल मिला और उन्हीं के सहारे आज हम खुद को स्थापित कर पाए।
मण्डप आर्ट अपनी त्रैमासिक पत्रिका भी निकलने को संकल्पित है।

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

कला और कल्पना

तुम्हारे होने का मैं यक़ीन करता हूँ और अगर दुनियावी लोगों को अपने ही जितना यकीन  दिला सकता। तो फिर हमारा इश्क समय के दायरे से बाहर हो जाता हमारी मुहब्बत के अमर होने का यही राज़ होता कि हमारी कहानियों को सुनाने और सुनने वाले को उस दुनिया की सैर करवाती जो इस काल खंड के परे है
कभी कभी लगता है कि समय के अनुसार मैं बहुत वषों बाद पैदा हुआ। या इस समय में मेरी कोई खास उपयोगिता नहीं है और कभी लगता है कि थोड़ी देर और हो जाती तो........कहीं संवेदनशीलता ने तो ज़्यादा जकड़ने की कोशिश तो शुरू नहीं कर दी। वजह सिर्फ इतना ही है कि चीजों को नए तरीके से देखने समझने लगा हूँ, घिसेपिटे तौर-तरीकों से मेरा इत्तेफाक नहीं है। चीजों को अपने और तुम्हारे सम्बन्ध के तराजू में तौलकर उसका भाव तय करता हूँ।
हमारे बचपन के सुख के दिन, जो अब हमारे जीवन में कभी नहीं लौटेंगे। क्या मैं कभी उसकी कोई भी स्मृति भुला सकता हूँ? उन दिनों के बारे में सोचकर मेरा मन बार-बार प्रफुल्लित हो जाता है अंतस में एक नवीन नूतन ऊँचाई के अनुभव को महसूस करने लगता हूँ।
याद आता है कि मेरे लिये किस तरह बातें सुनने के शौक को दबाना मुश्किल था। और तुम हमेशा बातों को कहती रहती थी। और मैं तुम्हारा प्यारा, मधुर स्वर सुनता रहता। नींद में डूब जाने के बाद भी मुझे तुम्हारी आकृति........
भीड़ में अपने आपको समेट कर बैठ रहता था। लोग सोचते थे/है। सोया हुआ है, सुस्त है, खोया हुआ है। जबकि मैं तुम्हारे शब्दों की खुशबू में उड़ता रहता था........आज भी तैरता रहता हूँ। यह जरूर है तुम अधिकतर मेरी कल्पना के रूप में ही दिखती हो चेहरा अब तो और कम साफ दिखता है जितना करीब पहुंचना चाहता हूँ उतना धुँधली और मोहक तुम्हारी तस्वीर हो रही है जिज्ञासा तेज़ी से बढ़ रही है। नीद से आनखे बोझिल हो जाती है। पलकें नींद से भारी हो जाती है। सब लोग सो जाते है और आधी नींद में मुझे लगता है कि बीकोई मुझे अपने कोमल हांथों से छू रहा है। मैं तो जान जाता हूँ कि यह सिर्फ  तुम्हारा स्पर्श है। और एक मीठा और चिर परिचित शब्द  कानों को सुनाई पड़ता है *उठो अब* और मैं अपने  दोनों बाजू  कंधे पर रख देता था और कहता हूँ मेरी प्यारी, मैं तुम्हें कितना ज्यादा चाहता हूँ।
और तुम्हारे होठो में उदास, मोहक मुस्कान सिमट आती है। मेरे माथे को चूमती हो और सर गोद में रख लेती हो। और उस दिन...........अच्छा! तो तुम मुझे बहुत चाहते हो। चुप्पी। सच बताओं मुझे हमेशा प्यार करोगे? कभी नहीं भूलोगे? जब मैं नहीं रहूंगी तब.....भूलोगे तो नहीं न?
मैं..................….…………....………………………

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

साँसे

जीवन जीने के लिए कला के साथ 20 वर्ष  पहले देख देखौवल हुआ, दोस्ती हुई। आरम्भ में तो लगा तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध ही मैं लगातार बस तुम्हारे पास रहने की कोशिश कर रहा हूँ, तुम्हारे निकट के लोग मुझे तुम्हारे पास फटकने ही नहीं देते थे और ऐसा भी नहीं था कि वो मुझे जबरदस्ती नहीं अाने दे रहे थे। बल्कि लगातार मेरा परीक्षण कर रहे थे कि मैं तुम्हारी निकटता या कहूँ कि दोस्ती को पाने के काबिल हूँ, मेरी नीयत साफ है या नहीं। तुम्हारी निकटता से ही मैंने खुद से दोस्ती की। खुद को जाना। तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध ही मैंने तुमसे एकतरफा इश्क किया है। तुम्हारी वजह से ही मुझे मेरी आवाज़ भी अच्छी लगने लगी और तुम्हारी आवाज़ का नशा पूरे ज़माने में चढ़ गया है। अक्सर लगता रहा कि मैंने शब्दों से दोस्ती कर ली है और सुरों से इश्क। और अब तो सुरोंऔर शब्दों के साथ रहते मैं कभी अकेला नहीं होता। इन्ही के साथ चाय पीता लेता हूँ और ठण्ड में भी इन्ही के साथ रज़ाई में चुहलबाज़ी होती है। दिन ब दिन मेरी सांसो के आरोह अवरोह में सुरो और शब्दों के ही धड़कन बन गये है। तुम्हारी याद आते ही शब्द सुरो में बदल गुनगुनाने लगते है और धड़कने लय में बदल जाते है। तुम ही मेरी सबसे सीधी साधी साथी हो तुम्हारे साथ रहता हूँ तो कब सुबह से दोपहर होती है कब शाम इल्म ही नहीं होता। जब ध्यान भंग होता है तो बीते समय को उधेड़ता हूँ कि शायद सुबह के धागे कही शाम में फंसे होंगे तो निकल आएंगे। पर कितने ही पापड़ बेले पर गुज़री सुरीली शाम नहीं मिलती और वही उधेड़बुन शुरू रहती है। अब ये मेरा इश्क है या नाटक जो मुझे तुमसे बंधे रखता है। लगता है जैसे मेरी रगों में अब खून नहीं तेरा इश्क बहने लगा है। बस ये इश्क बहना जिस दिन बंद होगा उसी दिन.………। सारा सुर, शब्द, लय, ताल, धुन सब बेसुरा बेताल हो जायेगा। उम्मीद करता हूँ तेरा इश्क मेरी रगों में उम्रभर बहता रहेगा और दुनिया हमारे इश्क पर फक्र करेगी। और उम्मीद करता हूँ कि पूरी दुनिया मेरी तरह तेरे इश्क के कलाम लिखेगा, सुरों को सजाएगा, और शब्दों की रचना करेगा।
अब आगे क्या लिखूँ तुम खुद ही ज्ञान के सागर हो थोड़े को बहुत समझों तुम्हारे जवाब के इंतज़ार में

मनोज कुमार मिश्रा

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

कला के नाम पत्र

तुम्हारे लिए सिर्फ
शब्दों की कमी से मैं लगातार जूझ रहा हूँ। कहने को रोज बहुत रहता है पर जैसे ही समय होता है कहने का, हमेशा मन मार बैठ जाता हूँ  कि कहीं तुम पूँछ न लो की तुम कैसे हो। इसका जवाब ही नहीं मिल पा रहा है तो बात आगे कैसे बढ़ेगी, हालाँकि जरूर गड़बड़ मेरी ही तरफ़ से होगी नहीं तो क्या कोई इतना सताता है परेशां करता है।
खैर आज फिर हिम्मत तो जुटा लिया पर कमबख्त शब्दों ने धोखा दे ही दिया। समय पर ये हथियार काम नहीं आये।  इस बार फिर से इशारे से बात होगी क्या? तुम्हारी इसी तासीर पर तो मैं फ़िदा हूँ। न इधर - न उधर, बिना क्रोध के चाहे कितना ही छींटाकसी करे, तुम्हारे लिए, तुम सिर्फ मुस्कुराती चलती जाती हो।
कभी कभी तो डर बहुत लगता है कि कहीं तुमने मेरी इस तंग गली से निकलना बंद कर दिया तो मैं क्या करूंगा और कुछ आता भी तो नहीं है।
खाना पीना छोड़ भी नहीं सकता क्योकि भूख बहुत लगाती है। और मुझे तो तेरा स्वाद लग गया है। कोई कुछ कहे अब तो फर्क नहीं ही पड़ता है। *बद अच्छा बदनाम बुरा* अब जो होगा देखा जायेगा।
फिलहाल इतना ही
सिर्फ तुम्हारा,
मनोज कुमार मिश्रा