बुधवार, 5 नवंबर 2025

मनोहर सिंह: अभिनय-प्रशिक्षण की दृष्टि, चरित्र-निर्माण की पद्धति और रंग-संस्कार की परंपरा

भारतीय रंगमंच का इतिहास केवल नाटकों और मंचीय प्रस्तुतियों की गाथा नहीं है, बल्कि उन अद्भुत अभिनेताओं की साधना का भी इतिहास है, जिन्होंने अभिनय को ‘अध्यात्म’ और ‘अनुसंधान’ का रूप दिया। उनमें से एक प्रमुख नाम है — मनोहर सिंह । उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) के सुविचारित प्रशिक्षण-संस्कार से लेकर रंगमंच की जीवंत परंपरा तक अभिनय को एक अनुशासन और जीवन-अनुभव में बदल दिया। उनकी अभिनय-दृष्टि, प्रशिक्षण-पद्धति और चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया ने न केवल समकालीन रंगकर्म को दिशा दी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक जीवंत नज़ीर छोड़ी।
हिमाचल प्रदेश के क्वारा गाँव में जन्मे मनोहर सिंह का अभिनय-संस्कार आरंभ से ही लोकजीवन की सहजता से जुड़ा था। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली से उनका औपचारिक प्रशिक्षण प्रारंभ हुआ — वही संस्थान जिसने भारतीय रंगमंच को अनेक दिग्गज कलाकार दिए। नाट्यविद्यालय में उन्होंने एब्राहिम अल्काज़ी जैसे अनुशासित निर्देशक-शिक्षक से सीखा कि अभिनय केवल “प्रदर्शन” नहीं, बल्कि “जीवंत अनुशासन” है।
एनएसडी से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमण्डल के संस्थापक सदस्यों में रहे और बाद में इसके प्रमुख बने। इस भूमिका में उन्होंने एक प्रशिक्षक, निर्देशक और कलाकार — तीनों की भूमिकाएँ एक साथ निभाईं। मनोहर सिंह का अभिनय-प्रशिक्षण न केवल तकनीक का अनुशासन था, बल्कि संवेदना की साधना भी। उनके अनुसार, “रंगमंच दो-तीन घंटे में जीवन के उतार-चढ़ाव से गुज़र जाने जैसा है, यह आपको भीतर तक जला देता है।”
यह कथन उनकी दृष्टि का सार है — वे अभिनय को जीवन के यथार्थ की तात्त्विक पुनर्रचना मानते थे।

उनकी प्रशिक्षण-पद्धति के तीन प्रमुख आयाम थे:
(क) अनुभव से अभिनय

मनोहर सिंह अपने विद्यार्थियों को यह सिखाते कि किसी पात्र को निभाने से पहले, उसे जीने का प्रयास करो। वे कहते थे कि कलाकार को पहले अपने अनुभव-संसार को विस्तार देना चाहिए — पढ़ना, देखना, लोगों से मिलना, समाज को समझना — ताकि मंच पर पात्र का अनुभव सच्चा लगे।

(ख) अनुशासन और शरीर-भाषा
एनएसडी में उन्होंने इब्राहिम अल्काज़ी से “अभिनय के अनुशासन” की परंपरा सीखी थी — जैसे कि वाणी-नियंत्रण, मंच-स्थिति, शरीर-संतुलन। वे यह मानते थे कि कलाकार का शरीर उसका सबसे बड़ा उपकरण है।
उनके प्रशिक्षण-सत्रों में यह देखा गया कि वे कलाकारों से लगातार ‘वॉर्म-अप’ और ‘बॉडी-रिद्म’ का अभ्यास करवाते, ताकि अभिनय में ऊर्जा और प्रवाह बना रहे।

(ग) संवेदना का आत्मानुभव
वे अभिनय को केवल बाह्य क्रिया नहीं मानते थे। उनके अनुसार, “जब तक आप पात्र की पीड़ा महसूस नहीं करते, तब तक मंच पर उसका रूप नहीं गढ़ सकते।” यही कारण था कि उन्होंने ‘तुगलक’ जैसे जटिल पात्र को भी भीतर से आत्मसात किया — एक ऐसी भूमिका जो सत्ता, पागलपन और आत्म-विनाश की सीमाओं को छूती है। मनोहर सिंह के अभिनय की विशिष्टता यह थी कि वे पात्र को केवल ‘निभाते’ नहीं थे, बल्कि ‘बनते’ थे। उनकी चरित्र-निर्माण प्रक्रिया चार स्तरों पर चलती थी।
अध्ययन — वे भूमिका के सामाजिक, ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष का गहन अध्ययन करते।
आत्मसात — पात्र की भावनाओं को अपने भीतर जगह देते।
प्रयोग — मंच पर अलग-अलग रूपों में पात्र को गढ़ते, संवादों और मुद्राओं के साथ प्रयोग करते।
प्रस्तुति — दर्शक की प्रतिक्रिया के अनुसार भूमिका को पुनः आकार देते।

उनका यह दृष्टिकोण “Stanislavski System” की तरह “अंदर से अभिनय” (Method Acting) के निकट था, परन्तु भारतीय संवेदना से जुड़ा हुआ। वे कहा करते थे कि “हमारा थिएटर भारत के मनोविज्ञान से जन्म लेता है, उसे पश्चिमी ढाँचे में बाँधना उचित नहीं।”

“अलकाज़ी के अनुसार, ‘मनोहर के अंदर आत्मा की उच्चता, आत्म-निष्ठा और पूरी निष्ठा थी’।

मनोहर सिंह केवल अभिनेता नहीं थे, वे एक सधे हुए प्रशिक्षक भी थे। उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमण्डल में युवा कलाकारों को प्रशिक्षण दिया — जिनमें आगे चलकर कई प्रसिद्ध अभिनेता बने। वे अभिनय को “शिल्प और साधना” दोनों मानते थे।
उनकी कार्यशालाओं में दो बातें विशेष रूप से ध्यान देने योग्य थीं: मौन का अभ्यास — वे कहा करते, “अभिनय का अर्थ बोलना नहीं, मौन में भी संवाद करना है।” समूह-संवेदना — वे अभिनय को सामूहिक रचना मानते थे। उनके प्रशिक्षण में कलाकारों को एक-दूसरे की ऊर्जा के प्रति सजग रहना सिखाया जाता था।

भारतेन्दु नाट्य अकादमी, लखनऊ में आप अतिथि प्रशिक्षक, सोसाइटी सदस्य, पाठ्यक्रम समिति आदि में जीवंत और सजग उपस्थिति होती थी यहाँ उनके रंग-संस्कार की छाप देखी जा सकती है। यहाँ की अभिनय-पद्धति में “चरित्र-अन्वेषण” और “अनुभव-संपृक्ति” के जो तत्व हैं, वे मनोहर सिंह की परंपरा से ही प्रेरित हैं।

नाट्य-कृतियाँ और प्रयोगशील दृष्टि

मनोहर सिंह की रंग-यात्रा में अनेक नाट्य-कृतियाँ मील का पत्थर रहीं —‘तुगलक’ (गिरीश कर्नाड) में उनका अभिनय एक मानक माना गया; ‘आधे-अधूरे’ (मोहन राकेश) में उनके पात्र की मनोवैज्ञानिक जटिलता दर्शकों को भीतर तक छू गई; ‘बेगम बारवे’ और ‘हिम्मत माई’ में उन्होंने लिंग-परिवर्तनशील अभिनय की अनोखी मिसाल पेश की; ‘हिम्मत माई’ जिन दर्शकों ने देखा है वह स्मृति के अमिट पटल पर उकेर दिया गया है जो कभी धूमिल नहीं होगा।

उनकी यह क्षमता कि वे पुरुष और स्त्री दोनों के भाव-संवेद को समान गहराई से पकड़ लें — उनके प्रशिक्षण का परिणाम थी। यह केवल अभिनय नहीं, बल्कि भाव-अभ्यास था — अपने भीतर मौजूद स्त्री-पुरुष, भय-साहस, प्रेम-क्रोध के युग्म को संतुलित करना।

थिएटर से टेलीविज़न और सिनेमा तक

मनोहर सिंह ने बाद में टेलीविज़न और सिनेमा की दुनिया में भी कदम रखा — ‘कथा’, ‘मम्मो’, ‘दामुल’, ‘तामस’ जैसी फिल्मों में उनकी उपस्थिति स्मरणीय रही। परंतु वे मंच को कभी नहीं भूले। उन्होंने कहा था, “रंगमंच मेरा घर है, बाकी सब यात्राएँ हैं।” यह कथन उनके पूरे जीवन-दर्शन का सार है — अभिनय उनके लिए जीविका नहीं, साधना थी।
मनोहर सिंह का रंगदर्शन गहराई में मानव-मनोविज्ञान से जुड़ता है। वे मानते थे कि हर पात्र के भीतर एक मनुष्य छिपा है — उसका दर्द, उसकी कामना, उसका द्वंद्व। अभिनेता का काम है उस मनुष्य को खोज निकालना।
उनकी प्रशिक्षण-दृष्टि में इसलिए मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एक केंद्रीय तत्व था। वे छात्रों से कहते — “संवाद रटने से पहले यह जानो कि पात्र यह क्यों कह रहा है।” उनका यह दृष्टिकोण आज के आधुनिक रंगशिक्षण में भी प्रासंगिक है — जहाँ अभिनय को केवल तकनीक नहीं, बल्कि ‘भाव-अनुसंधान’ के रूप में देखा जाता है। मनोहर सिंह को 1982 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने उनके योगदान की स्मृति में ‘मनोहर सिंह स्मृति पुरस्कार’ की स्थापना की। यह केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि उस जीवंत परंपरा की स्वीकृति है जिसमें वे थिएटर को आत्म-अनुशासन और आंतरिक खोज का माध्यम मानते थे।
आज जब अभिनय-शिक्षा में तेज़ी से व्यावसायिक दृष्टिकोण (कैमरा अभिनय) बढ़ा है, मनोहर सिंह की पद्धति हमें यह याद दिलाती है कि अभिनय केवल कैमरा-फ्रेम नहीं, मानवीय अनुभव का विस्तार है।
उनका प्रशिक्षण मॉडल — आत्म-संवेदना, अनुशासन, सामाजिक दृष्टि और निरंतर अभ्यास पर आधारित था। यही चार स्तंभ आज भी किसी भी रंगमंचीय-संस्थान के लिए दिशा-सूचक हैं।
भारतीय रंगमंच में मनोहर सिंह का योगदान इस अर्थ में अद्वितीय है कि उन्होंने अभिनय करने को भारत में चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया बना दिया — जहाँ अभिनेता स्वयं अपने भीतर के अंधकार और प्रकाश दोनों से परिचित होता है। मनोहर सिंह भारतीय रंगमंच के उस पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं जिन्होंने अभिनय को एक ‘साधना-प्रक्रिया’ के रूप में देखा। उनकी प्रशिक्षण-पद्धति ने रंगकर्म को जीवन-अनुभव, अनुशासन और संवेदना के संगम में बदला। और भारतेन्दु नाट्य अकादमी की प्रयोगात्मक भूमि पर खड़े होकर उन्होंने अभिनय को विचार, अध्ययन और भावनात्मक ईमानदारी से जोड़ा। उनकी विरासत यह सिखाती है कि एक सच्चा अभिनेता केवल मंच पर नहीं बनता, बल्कि जीवन के हर अनुभव में अभिनय सीखता है — और यही मनोहर सिंह की अभिनय-दृष्टि का शाश्वत संदेश है।

मंगलवार, 4 नवंबर 2025

मुद्राराक्षस : जनमंच से नेपथ्य तक और असहमति का सौंदर्य

“कला जो सजाती नहीं, जगाती है।”

लखनऊ की मिट्टी में एक अजीब जादू है —
यहाँ ज़ुबान भी शराफ़त से बोलती है और विरोध भी तहज़ीब में लिपटा होता है। इसी मिट्टी ने जन्म दिया उस रचनाकार को,
जिसने रंगमंच को केवल मनोरंजन नहीं, जनचेतना का औजार बना दिया। वह थे — मुद्राराक्षस।

नाम ऐसा, जो एक साथ चौंकाता भी है और अर्थ का नया संसार भी खोल देता है।
सुभाष चंद्र आर्य से ‘मुद्राराक्षस’ बनने की यह यात्रा, दरअसल एक लेखक के भीतर उठती उस बेचैनी की कहानी है, जो शब्दों में सुलगती है और मंच पर आग बनकर जल उठती है।

लखनऊ की रगों में बसा रंग

21 जून 1933 — बेहटा, लखनऊ की एक सुबह। हवा में अवधी का अपनापन था, और इतिहास की सांझ में नया देश आकार ले रहा था। इसी वातावरण में जन्मे मुद्राराक्षस ने लखनऊ विश्वविद्यालय से शिक्षा ली, पर सीखा समाज से — उस समाज से जो तब भी वर्ग, जाति और सत्ता की दीवारों में बँटा था। उन्होंने महसूस किया कि जब तक आदमी की सोच पर डर का पहरा है, कला की कोई आज़ादी नहीं। यहीं से शुरू हुई उनकी यात्रा—रंगमंच के ज़रिए समाज से संवाद करने की यात्रा।

‘मुद्राराक्षस’ — विशाखदत्त के प्रसिद्ध नाटक का वह मंत्री जो छल के विरुद्ध नीति का प्रतीक था। मुद्राराक्षस जी ने यही नाम इसलिए अपनाया, क्योंकि वे सत्ता के दरबार में नहीं, सत्य के मंच पर खड़े लेखक थे। उनकी दृष्टि में लेखक वही है, जो तख़्त से नहीं, ज़मीर से सवाल करता है। “लेखक अगर सबको पसंद आने लगे, तो समझो उसने सच्चाई से मुँह मोड़ लिया।” मुद्राराक्षस के लिए नाटक कभी तमाशा नहीं था। वह जनजीवन का साक्षात्कार था, जहाँ हर पात्र अपने समय का गवाह बनता है। उन्होंने मंच को ‘लोक’ से जोड़ा, और कला को सत्ता से अलग किया। उनके नाटक दर्शकों से संवाद नहीं, मुक़ाबला करते हैं।

उनकी प्रमुख कृतियाँ —
‘आला अफ़सर’, ‘बदबख़्त बादशाह’, ‘दंडविधान’, ‘कालातीत’, ‘हस्तक्षेप’, ‘आत्माराम’ आदि समाज की दुखती नब्ज़ पर उँगली रखती हैं।
आलाअफसर नाटक - व्यंग्य का दरबार
‘आला अफ़सर’ में मुद्राराक्षस एक छोटे कस्बे की नौकरशाही का ऐसा चित्र खींचते हैं
जो आज भी हमारे आसपास दिखता है।
एक काल्पनिक आला अफ़सर के आने की अफ़वाह पूरे शहर को भ्रष्ट बना देती है —
हर अधिकारी झूठे दिखावे में मग्न,
हर व्यक्ति डर की गिरफ्त में। यह नाटक सत्ता के भय की मनोविज्ञानिक व्याख्या है। वह दिखाता है कि डर ही सबसे बड़ा अफ़सर है। भाषा में अवधी की मिठास है, और व्यंग्य में लखनऊ का नमक। संवाद ऐसे हैं जो हँसाते भी हैं और भीतर तक चुभ जाते हैं-“हमारे यहाँ ईमानदारी की पोस्ट खाली पड़ी है पर कोई आवेदन देने की हिम्मत नहीं करता।” ‘आला अफ़सर’ में मुद्राराक्षस ने ब्रेख्तीय दूरीकरण को भारतीय लोकशैली में ढालकर रंगमंच को विचार का अखाड़ा बना दिया।

‘बदबख़्त बादशाह’ : सत्ता का आत्मसंवाद

‘बदबख़्त बादशाह’ उनके सबसे गूढ़ और दार्शनिक नाटकों में है। यह एक ऐसे शासक की कथा है जो सत्ता की ऊँचाई पर है,
पर भीतर से भय और एकांत में घिरा है।
मंच पर यह नाटक रोशनी और छाया, ध्वनि और मौन का अद्भुत संयोजन है।
बादशाह के संवाद अपने आप से संवाद बन जाते हैं — एक मानसिक रंगभूमि जहाँ सत्ता की चुप्पी सबसे बड़ा शोर है।  “राजा के पास सब है — दरबार, तलवार, तख़्त, बस एक चीज़ नहीं — यकीन।” मुद्राराक्षस यहाँ ‘नेपथ्य’ की तकनीक से दृश्यहीन घटनाओं को प्रकट करते हैं 

लोक और आधुनिकता का संगम

मुद्राराक्षस के नाटक में लोकगीत, कवित्त, संवाद और प्रतीक समान रूप से नृत्य करते हैं। उनकी रंगभाषा गंगा-जमुनी तहज़ीब से सनी हुई है। वह आधुनिकता को लोक की लय में पिरोते हैं।

उनके मंच पर ‘वाचक/सूत्रधार/नट, नाती’ आदि पात्र अक्सर दिखाई देता है — जो कथा कहता है, समाज पर टिप्पणी करता है,
और दर्शक को सोचने पर मजबूर करता है।
यह प्रयोग भारतीय पारंपरिक रंगमंच और पाश्चात्य के बर्तोल्त ब्रेख्त की शैली से मिलता है, पर मुद्रा जी लेखनी में स्वाद पूरी तरह भारतीय है।

विचार की निष्ठा, विचारधारा से परे

मुद्राराक्षस किसी एक विचारधारा के लेखक नहीं थे, बल्कि विवेक के लेखक थे। किसी की दासता नहीं स्वीकारी। मुद्रा जी का लेखन वर्ग और जाति के संघर्षों को
संवेदनशील यथार्थ में रूपांतरित करता है। वे कहते थे —  “कला वही है जो आदमी को आदमी से मिलाए।”

मुद्राराक्षस ने हिंदी नाट्य-आलोचना को नई दिशा दी। आपकी पुस्तकें ‘हिंदी नाटक और रंगमंच’, ‘सृजन की सामाजिकता’, ‘नाट्य और समय’ — आज भी नाट्य अध्ययन और विवेचना के ग्रंथ माने जाते हैं। बाल-साहित्य में मुद्रा जी ने न्याय और कल्पना का संतुलन रचा। उनकी कहानियों में बच्चों के ज़रिए बड़ों की मूर्खता पर व्यंग्य किया गया है।

लखनऊ की तहज़ीब में विद्रोह की चमक

लखनऊ ने उन्हें भाषा दी और उन्होंने लखनऊ को आवाज़ दी। उनकी लेखनी में नफ़ासत है, मगर भीतर लावा भी। वे वही कहते थे जो ‘कहना जरूरी’ था, भले उससे किसी का दरबार नाखुश क्यों न हो जाए।

कई बार तो यह वाक्य सीधा आता था कि  “मैं लखनऊ का हूँ, इसलिए मुस्कराकर विरोध करता हूँ।”

13 जून 2016 को मुद्राराक्षस इस धरती से विदा हुए, पर उनके शब्द अब भी मंच पर जीवित हैं — कभी नुक्कड़ पर, कभी विश्वविद्यालय के सभागार में, कभी किसी अभिनेता की आँखों में जो असलियत कहना चाहता है। आज जब अभिव्यक्ति पर पहरे हैं, मुद्राराक्षस का रंगमंच हमें याद दिलाता है कि कला की असली ताकत उसकी असहमति में है। ‘आला अफ़सर’ आज भी किसी भी सिस्टम का आईना है, ‘बदबख़्त बादशाह’ आज भी सत्ता की तन्हाई की कहानी।

मुद्राराक्षस अब कोई व्यक्ति नहीं, एक दृष्टि, एक चेतना और एक ज़रूरत हैं। उनकी रचनाएँ बताती हैं कि रंगमंच तब जीवित होता है जब वह सवाल करता है। वे हमें सिखाते हैं कि मंच पर खड़ा अभिनेता सिर्फ़ पात्र नहीं, लोक की आवाज़ होता है। “शब्द जब मंच पर उतरते हैं, तो वे केवल संवाद नहीं, विद्रोह बन जाते हैं।”

हँसी की विदूषक-उड़ान: बंसी कौल की रंगभूमि, प्रयोग और संवेदना

हँसी की विदूषक-उड़ान: बंसी कौल की रंगभूमि, प्रयोग और संवेदना कश्मीर-जड़ों से निकलकर लोक-हँसी, विदूषक-परंपरा व शारीरिक अभिव्यक्ति के माध्यम से हिन्दी-रंगमंच में नया क्षितिज खोलने वाले बंसी कौल के रंग-साधना-यात्रा|

मंच पर एक विदूषक जब मुखौटा पहनता है, तब सिर्फ हँसी उत्पन्न नहीं होती—वह संवेदना, चिंतन और लोक-स्मृति का भी आरंभ होती है। बंसी कौल की रंग-जगत में यह विदूषक-उड़ान उसी दिशा की ओर इशारा करती है। उनके नाट्य-अनुभव, प्रयोग-शैली, प्रशिक्षण-दृष्टि और दृश्य-निर्माण ने हिन्दी रंगमंच को सिर्फ नया रूप नहीं दिया बल्कि एक नया मनोसेतु स्थापित किया। इस लेख में हम उनकी रंगकर्म-यात्रा को उस सतह से उठाकर देखेंगे जहाँ लोक, हँसी, मंच-दृष्टि और सामाजिक-साक्ष्य आपस में पूर्णता से मिलने लगे।

बंसी कौल का जन्म 23 अगस्त 1949 को श्रीनगर (जम्मू एवं कश्मीर) में हुआ। एक कश्मीरी पंडित-परिवार से आने वाले कौल बचपन से चित्रकला-रंग और अभिनय-उत्सव के प्रति संवेदनशील थे। दिल्ली आकर National School of Drama (NSD) में स्टेजक्राफ्ट में शिक्षा ली और वहाँ से स्नातक हुए। उनकी पृष्ठभूमि ने उनके मन में मंच-स्थान, देह-भाषा, दृश्य-निर्माण और लोक-शैलियों के प्रति गहरी संवेदना जगाई। उनकी प्रारंभिक रंग-खोज केवल अभिनेता-भूमि तक सीमित नहीं रही; वे डिज़ाइन-मंच, स्थल-संकल्प, लोक-हँसी-निर्माण तक विस्तारित हुई।

1984 में उन्होंने भोपाल में अपनी संस्था Rang Vidushak की स्थापना की। संस्था का उद्देश्य था: “जहाँ हँसी नया उत्सव-भाषा बने।” 
“For the stage artist, Proscenium Barrier must be broken in the mind first, rather than the body.”
इसका अर्थ यह था कि दर्शक-मंच विभाजन सिर्फ फिजिकल नहीं—मानसिक भी है। उन्होंने लोक-खेल, जोकर-हँसी, ग्रामीण-खेल, रस-गीतों और मिथकों को आधुनिक रंगभाषा में समाहित किया। रंग विदूषक ने सिर्फ प्रदर्शन नहीं की, बल्कि कलाकार-प्रशिक्षण, स्थल-शोध, लोक-अनुभव-रूपांतरण भी किया।

कौल की रंगदृष्टि ने मनोरंजन और चिंतन के बीच सेतु बनाया। उन्होंने रंगमंच को सिर्फ ‘दिखाने’ का माध्यम नहीं माना, बल्कि जीने, सोचने, साझा अनुभव बनाने का। आपने हँसी को सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि विप्लव-भाषा बनाया। आपके नाटकों में नौटंकी, भवई-परंपरा, विदूषक-शैली और संघर्ष है। नाटको के मंचन केवल शहरी-मंच में नहीं, बल्कि गाँव-मंच, खुला-मंच, अवहेलित-स्थल में करने का प्रयास करते रहे। अक्सर वो एक उद्धरण दिया करते थे कि ‘विदूषक’ को सिर्फ जोकर नहीं बनाया है—बल्कि मंच-चिंतक बनाना चाहता हूँ। इस दृष्टि से उनका रंगमंच ‘हँसकर - सोचने’ का स्थान बना।
 आपने रूस के निकोलाई गोगोल के द गवर्नमेंट इंस्पेक्टर नाटक को आदरणीय मुद्रा राक्षस जी से “आला अफसर” के रूप में लिखवाया। बंसी दादा ने आला अफसर को  नौटंकी-शैली में प्रस्तुत किया। कहन कबीर संत कबीर की रचनाओं पर आधारित नाटक है इसमें लोक-भाषा, भक्ति-चिंतन और सामाजिक-संदर्भ मिश्रित रूप में दिखते है। “सीढ़ी दर सीढ़ी उर्फ तुक्के पर तुक्का” चीनी लोककथा के आधार पर हिन्दी-मंच में रूपांतरित अद्भुत नाटक बनाया है। साथ ही सौदागर, पगलाए गुस्से का धुआँ, एक तारा टूटा, शबे तार, शर्विलक, मस्त कलंदर, तमंचा खान की ग़जब दास्तान, पल एक हंसी का, खेल गुरु का, रंग बिरंगे जूते आदि प्रमुख नाटक हैं जिनमें से कुछ नाटकों में लेखन में भी अपना रंग चढ़ाया। आपको फोर्ड फाउंडेशन से प्राप्त सहयोग प्राप्त हुआ। बंसी जी  ने रंग-शिक्षा को सिर्फ तकनीकी प्रशिक्षण नहीं माना, बल्कि जीवन-अनुभव का मंच माना। आपके नाटको में न्यून संसाधन से मंच पर अधिक प्रभावी लगाने लगते थे। कलाकार को पहले “मनुष्य” बनना है। बंसी जी केवल निर्देशक नहीं बल्कि दृश्‍य-निर्माता थे। उन्होंने मंच-डिजाइन, सेट-सैटिंग, मुख-सज्जा में नयापन लाया। आप 1986-87 में खजुराहो नृत्य महोत्सव के आर्ट-डायरेक्टर थे तथा 2010 के कॉमन वेल्थ गेम के उद्घाटन-समारोह में डिजाइन-टीम में शामिल थे। आपका मानना था कि कोई माध्यम सीमा नहीं, वरन अवसर है—चाहे बजट कम हो, मंच चालू-खुला हो।
आपके नाटकों की भाषा-शैली में अनूठा मिश्रण मिलता था — लघु एवं तीव्र संवाद, देह-भाषा का प्रयोग, लोक-उच्चार, और सहज-लोक-भाव। इस वजह से उनका रंगमंच ‘लोक’ और ‘शहर’ दोनों का था। लोक-हँसी को उन्होंने लोकप्रियता के साधन के रूप में नहीं, बल्कि संवेदन-भागी के रूप में देखा। उनके नाटकों में यही संतुलन था- मनोरंजन और विचार, खेल-हँसी और सामाजिक-चिंतन। आप हंसी एक उत्सव थे। कुल मिलाकर बंसी कौल की तकनीक रंगशिल्प में भराव लाती है। उनके निर्देशक, अभिकल्पक और दृश्यकल्पक व्यक्तित्व की अन्विति बनती है। कौल का रंग-मुहावरा देखने-सुनने में जितना सीधा-सरल लगता है, उतना ही दुरूह है। उसकी जड़ों के लिए उस जमीन की समझ आवश्यक ठहरती है, जिसमें वह गढ़ा गया
बंसी जी का रंगमंच सिर्फ कला-भूमि तक सीमित नहीं था; उसमें सामुदायिक-स्मृति, विस्थापन, लोक-विमर्श का समावेश था। उनकी आखिरी प्रस्तुति “पगलाए गुस्से का धुआँ” कश्मीर-पंडितों के विस्थापन पर आधारित थी। जिसे भारतेन्दु नाट्य अकादमी के छात्रों के साथ प्रस्तुत किया था इस समय मैं नाटक में प्रकाश परिकल्पना कर रहा था तो कहा कि मनोज तुम नाटक बन्द मत करना अभी तुम्हारे अंदर नाटक को खोजने की ललक बहुत भरी हुई है।

आपको मध्य प्रदेश सरकार से 1994 का शिखर सम्मान और उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी से 1995 का सफदर हाशमी सम्मान संगीत नाटक अकादमी सम्मान 1995 और पद्मश्री सम्मान 2014, कालिदास सम्मान 2016 में प्रदान किया गया। यदि रंगमंच को एक वृक्ष मान लें, तो बंसी कौल ने उसे ‘लोक-जड़’ से उगाया, ‘हँसी-फल’ से सजाया और ‘चिंतन-फल’ से परिरक्षित किया। उनके मंच-उपकरण-जोकर-मुखौटा, लोक-गीत, देह-प्रकाश-लय- केवल दृश्य-नाट्य नहीं बल्कि मानव-अनुभूति-माध्यम बने। उनकी अनुपस्थिति में भी उनकी छाया बनी हुई है — यह स्मरण कराती है कि लोक और आधुनिकता, हँसी और विचार, मंच और जीवन के बीच द्वंद्व नहीं, समन्वय हो सकता है।
 “थिएटर को सस्ता-पोस्टर नहीं, संवेदन-सूचना बनाना चाहिए।” – बंसी कौल 

बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

इरफ़ान सौरभ: बाल रंगमंच के क्षेत्र में उनका योगदान

इरफ़ान सौरभ: बाल रंगमंच के क्षेत्र में उनका योगदान

भोपाल, मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक भूमि हमेशा से कला और रंगकर्म की दृष्टि से उर्वर रही है। इसी भूमि ने अनेक ऐसे कलाकार दिए हैं जिन्होंने भारतीय रंगमंच को नई दिशा प्रदान की। उन्हीं में एक उल्लेखनीय नाम है — इरफ़ान सौरभ, जिन्होंने बाल रंगमंच के क्षेत्र में अपनी सृजनशीलता, समर्पण और प्रयोगशीलता से एक विशिष्ट पहचान बनाई।

पेशे से शिक्षक इरफ़ान सौरभ का रंगकर्म बालमन की जिज्ञासा, खेल और संवेदना को केंद्र में रखकर विकसित हुआ। वे मानते थे कि रंगमंच केवल मंच पर अभिनय नहीं, बल्कि सीखने और सोचने की प्रक्रिया है। इसीलिए उन्होंने बच्चों को दर्शक नहीं, बल्कि सहभागी माना। उनके नाट्य प्रयासों में बच्चे केवल संवाद बोलने वाले पात्र नहीं थे, बल्कि विचार व्यक्त करने वाले छोटे नागरिक थे, जिनके माध्यम से समाज और शिक्षा के बीच एक रचनात्मक सेतु बनता था।

उन्होंने भोपाल और आसपास के इलाकों में अनेक बाल नाट्य कार्यशालाएँ आयोजित कीं, जहाँ अभिनय को केवल कला नहीं, बल्कि आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया गया। इन कार्यशालाओं में बच्चों को कहानी गढ़ने, दृश्य रचने और समूह में काम करने की स्वतंत्रता दी जाती थी। इससे उनमें आत्मविश्वास और सामाजिक सहयोग की भावना विकसित होती थी।

इरफ़ान सौरभ के बाल नाटकों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे स्थानीय लोकसंस्कृति से गहराई से जुड़े थे। उनके नाटकों में मध्य प्रदेश की लोकभाषाओं, गीतों और प्रतीकों का सजीव प्रयोग मिलता है। इससे बाल दर्शक अपने आस-पास की दुनिया से सीधा संबंध महसूस करते हैं। उदाहरण के लिए, उनके नाटक “कचरा रानी” में पर्यावरण संरक्षण का संदेश लोकगीतों और हास्य के माध्यम से इस तरह प्रस्तुत किया गया कि वह बच्चों के लिए मनोरंजक होने के साथ-साथ शिक्षाप्रद भी बन गया।

उनके कई नाटकों में सामाजिक विषयों की झलक मिलती है — जैसे जल-संरक्षण, शिक्षा का अधिकार, लैंगिक समानता, और स्वच्छता। परंतु उन्होंने इन विषयों को किसी उपदेशात्मक ढंग से नहीं, बल्कि खेल, कल्पना और प्रतीक के माध्यम से प्रस्तुत किया। यही उनकी रंगदृष्टि की विशिष्टता थी — गंभीर बात को सरलता में ढाल देना।

इरफ़ान सौरभ ने शिक्षा और रंगमंच के संबंध को भी नए अर्थों में देखा। उनके अनुसार, “रंगमंच वह स्थान है जहाँ बच्चा सीखने की प्रक्रिया को जीता है, न कि केवल सुनता या पढ़ता है।” उन्होंने विद्यालयों में नाटक को शिक्षण-पद्धति का हिस्सा बनाने के कई प्रयोग किए। बच्चों ने नाट्य-अभिनय के माध्यम से इतिहास, विज्ञान और भाषा के पाठों को आत्मसात करना सीखा। इस प्रकार उनका बाल रंगमंच केवल सांस्कृतिक गतिविधि नहीं, बल्कि शिक्षाशास्त्र का एक सशक्त उपकरण बन गया।

मंच-संरचना की दृष्टि से इरफ़ान सौरभ सादगी और प्रतीकात्मकता में विश्वास रखते थे। वे मानते थे कि बाल रंगमंच का प्रभाव मंच की भव्यता से नहीं, बल्कि कल्पना की गहराई से आता है। इसलिए उनके नाटकों में रंग, ध्वनि, और गति का संयोजन बच्चों की कल्पनाशक्ति को सक्रिय करने के उद्देश्य से किया जाता था।

बाल रंगमंच के प्रति उनके इस समर्पण और नवाचार को विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाओं ने सराहा। उन्हें मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद और भारत भवन जैसे मंचों पर सम्मान प्राप्त हुआ। उनके नाट्य निर्देशन को राष्ट्रीय बाल नाट्य समारोहों में भी सराहा गया, जहाँ समीक्षकों ने उनके कार्य को “बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ” कहा।

इरफ़ान सौरभ का योगदान इस दृष्टि से विशिष्ट है कि उन्होंने बाल रंगमंच को केवल मनोरंजन के सीमित घेरे से निकालकर संवेदना, शिक्षा और समाज-निर्माण की दिशा में विस्तारित किया। उन्होंने यह साबित किया कि यदि रंगकर्मी बच्चे के मन, उसकी जिज्ञासा और उसके परिवेश को समझे, तो रंगमंच उसके व्यक्तित्व-निर्माण का सशक्त माध्यम बन सकता है।

उनकी रंगदृष्टि आज भी शिक्षकों, कलाकारों और अभिभावकों के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने जो रास्ता दिखाया — कि कला शिक्षा की आत्मा है, और बाल रंगमंच समाज का दर्पण — वही उनकी स्थायी विरासत है। आप रंगमंच में अलखनंदन के शिष्य और अभिनेता थे| वरिष्ठ रंगकर्मी इरफान सौरभ  64 वर्षीय इरफान कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे। खान सर के नाम से पहचाने जाने वाले इरफान 1973 से रंगमंच में सक्रिय थे। उन्होंने नाटक महानिर्वाण, चंदा बेड़नी, कबीरा खड़ा बाजार में जैसे नाटकों में अभिनय किया। आप मप्र संस्कृति विभाग के बाल रंगमंडल के प्रमुख भी थे।

डॉ. सचिन तिवारी इलाहाबाद

डॉ. सचिन तिवारी इलाहाबाद विश्वविद्यालय (Department of English) से जुड़े रहे हैं, इलाहाबाद विश्वविद्यालयमें रंगमंच के एक सक्रिय अकादमिक तथा नाट्य-प्रवर्तक (theatre practitioner) के रूप में पहचाने जाते थे। 

कैंपस थिएटर के निर्देशक/प्रमुख मार्गदर्शक के रूप में डॉ. सचिन तिवारी का काम विश्वविद्यालय के अंतर्गत छात्रएं और कलाकारों में नाट्य-परिदृश्य को लगातार सशक्त करने का रहा। छात्र-रंगकर्मियों का प्रशिक्षण, नाट्य-निर्माण की प्रक्रियाएँ तथा मंच-निर्माण/लाइटिंग/ध्वनि जैसी व्यावहारिक बातें कैंपस थिएटर की गतिविधियों का हिस्सा रहीं। आपने न केवल निर्देशन किया बल्कि शैक्षिक-रूप से रंगमंच को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम, कार्यशालाएँ और शोध गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास भी किया। जिसके लिए रंगमंच एवं फ़िल्म प्रभाग के स्थापना और संचालन में वे एक नियोजक के रूप में जुड़े रहे, जिससे फिल्म और थिएटर पर शोध जैसी योजनाएँ विश्वविद्यालय में आ सकीं। आप सक्रिय मेंटॉर और ईमानदार मार्गदर्शक रहे हैं। 

आपने विश्वविद्यालय के Theatre and Film Centre के काम में फ़िल्म एण्ड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया पूना  और सट्याजित रे फ़िल्म टेलीविजन इंस्टीट्यूट कोलकाता जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं के एक्सपर्ट्स के साथ तालमेल कर आपने अपने कैंपस-थिएटर कार्य को श्रेष्ठ  पेशेवर संस्थानों से जोड़ने की कोशिश की ताकि छात्रों को व्यावसायिक मानकों का प्रशिक्षण मिल सके। आप भारतेन्दु नाट्य अकादमी लखनऊ में पाश्चात्य रंगमंच के अतिथि प्राध्यापक थे। आपके छात्र रंगमंच और फिल्मों में विशेष और उल्लेखनीय कार्य नियमित रूप से कर रहे है जिनमें तिग्मांशू धूलिया, गोविन्द सिंह यादव, शशि भूषण, मनोज पाण्डेय (कथाकार) आदि प्रमुख हैं।

जावेद ज़ैदी : भोपाल के रंगमंच का सजीव स्वप्न

जावेद ज़ैदी : भोपाल के रंगमंच का सजीव स्वप्न

जावेद ज़ैदी मध्य भारत के रंगकर्म से जुड़े उन महत्वपूर्ण नामों में हैं जिन्होंने नाटक को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक संवाद का माध्यम माना। दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होंने भोपाल को अपनी कर्मभूमि बनाया और रंगकर्म को नई भूमि प्रदान की ।

भारत भवन के रंगमंडल से उनका गहरा जुड़ाव रहा। आप भारत भवन रंगमंडल के प्रमुख रहे। भारत भवन, भारतीय सांस्कृतिक जीवन का प्रमुख केन्द्र है, वहाँ जावेद भाई ने अनेक प्रयोगात्मक प्रस्तुतियों में ब0 व0 कारंथ, हबीब तनवीर, फ्रिट्ज बेनेविट्ज़, अलखनंदन आदि के प्रमुख सहयोगी रहे । आपका दृष्टिकोण मंच को यथार्थ और स्वप्न के बीच की जगह बनाना था—जहाँ समाज की जटिलताएँ, मानवीय संवेदनाएँ और विरोधी स्वर भी मिलते हैं।

आपने भोपाल में ‘संभावना रंग समूह’ की स्थापना की, जो आपके निर्देशन में मध्यप्रदेश का एक सशक्त नाट्य-समूह बना। इस समूह ने एक टूटी हुई कुर्सी, टोपी शुक्ला, इस साले साठे का क्या करूँ, मुगलों ने सल्तनत बख्स दी, आदि प्रमुख नाटकों की प्रस्तुति की। साथ ही अलखनंदन जी के निर्देशन में रामेश्वर प्रेम जी के नाटक 'चारपाई' में बूढ़े की मुख्य भमिका के लिए आपको सदैव याद किया जाता है। आपके नाटकों में समकालीन समाज की विडंबनाएँ, राजनीतिक ढाँचे की विसंगतियाँ और व्यक्ति की आत्मिक खोज झलकती है। ज़ैदी जी की शैली में संवाद की गहराई, दृश्यबोध की संवेदनशीलता और अभिनेता के मनोविज्ञान की सटीक पकड़ दिखाई देती थी। नाट्य प्रस्तुति 'एक टूटी हुई कुर्सी' ने दर्शकों और समीक्षकों दोनों को आकर्षित किया — इसमें टूटती हुई सत्ता और टूटते हुए विश्वास की प्रतीकात्मक कथा थी। उनके नाटक उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता और रंगभाषा की परिपक्वता का उदाहरण हैं। 2014 में जब वे विजय तेंदुलकर का नाटक कमला भारत भवन में प्रस्तुत करने की तैयारी में थे, तभी बीमारी के चलते उनका निधन हो गया। और “भोपाल रंगमंच का महत्वपूर्ण स्तंभ” टूट गया।

जावेद ज़ैदी का रंगकर्म एक सेतु की तरह थे पारंपरिक भारतीय रंगपरंपरा और आधुनिक विचारधारा के बीच। उन्होंने थिएटर को लोकजीवन, राजनीति और मनोविज्ञान के सम्मिलित बिंब के रूप में देखा। उनकी स्मृति आज भी भोपाल के मंचों, कलाकारों और दर्शकों के बीच जीवित है — एक ऐसे कलाकार के रूप में जिसने थिएटर को जीवन की सच्चाई से जोड़ा।

अलखनन्दन: लेखक, निर्देशक, पत्रकार और रंगमंच के सिद्धांतकार

अलखनन्दन: लेखक, निर्देशक, पत्रकार और रंगमंच के सिद्धांतकार

भारतीय रंगमंच का इतिहास जितना शास्त्रीय परंपराओं से समृद्ध है, उतना ही आधुनिक युग में सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलनों से भी प्रभावित रहा है। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हिन्दी रंगमंच को जिन कलाकारों ने नयी दिशा दी, उनमें अलखनन्दन का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे केवल मंचीय निर्देशक ही नहीं बल्कि लेखक, पत्रकार, शिक्षक, रंग-चिन्तक, कवि और सिद्धांतकार भी थे।
उनकी दृष्टि में रंगमंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि लोक-संस्कृति, सामाजिक चेतना और कलात्मक प्रयोगों का संगम था। ग्रामीण अंचलों में रंगकर्म को पहुँचाना, लोक नाट्य स्वाँग और बुंदेलखण्डी नाट्य-शैलियों को पुनर्जीवित करना, बाल-रंगमंच को प्रोत्साहन देना और शहरी-ग्रामीण दर्शकों के बीच संवाद स्थापित करना उनके कार्य की विशेषता रही।
अलखनन्दन जी का जन्म बिहार के में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा स्थानीय विद्यालयों में प्राप्त करने के बाद वे साहित्य और रंगमंच की ओर प्रवृत्त हुए। रंगकर्म की शुरुआत उन्होंने पत्रकारिता के साथ की—सामाजिक मुद्दों पर लिखते हुए उन्हें समझ में आया कि रंगमंच जनता तक सीधे पहुँचने का सर्वाधिक प्रभावी माध्यम हो सकता है। उनका रंगमंचीय सफर जबलपुर और भोपाल जैसे सांस्कृतिक नगरों से जुड़ा।
मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में विवेचना के लिए नाटकों का निर्देशन किया और बाद में भारत भवन रंगमंडल में सहायक निदेशक के रूप में कार्य किया। फिर नटबुंदेले रंग संस्था की स्थापना की। आप भारतेन्दु नाट्य अकादमी और पंजाब विश्वविद्यालय के नाट्य विभाग में अतिथि निर्देशक के रूप में कार्य किया। उर्दू थिएटर ट्रस्ट, बंगलौर तथा देश के कई संस्थानों में नाट्य कार्यशालाएँ संचालित कीं।
अलखनन्दन जी ने कई नाटक लिखे जिनमें उनके सामाजिक सरोकार और व्यंग्यात्मक दृष्टि स्पष्ट दिखती है: चंदा बेड़नी – समाज के हाशिये पर जी रही महिला की कथा। राजा का स्वांग, उजबक राजा, तीन डकैत, स्वांग मल्टीनेशनल, स्वांग शकुंतला – सत्ता, भ्रष्टाचार और व्यवस्था की विसंगतियों पर प्रहार दिखता है। उनके लेखन में भाषा का लोकजीवन से जुड़ा सरल, प्रभावी और हास्य-व्यंग्य मिश्रित स्वरूप मिलता है।
निर्देशक के रूप में उनकी प्रतिभा ने हिन्दी रंगमंच को नए प्रयोगों से परिचित कराया। उन्होंने न केवल अपने नाटक बल्कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय लेखकों के नाटक भी मंचित किए: वेटिंग फ़ॉर गोड़ो का छत्तीसगढ़ी अनुवाद गौड़ा ला देखत हन, महानिर्वाण, मगध, ताम्रपत्र, सुपनवा का सपना, चारपाई,ताँबे के कीड़े, काव्यरंग, अँडोरा,  अखाड़े के बाहर, भगवदज्जुकम्, उजबक राजा तीन डकैत आदि प्रमुख हैं उनके निर्देशन में नाटकों की दृश्य संरचना, लोकगीतों और संगीत का प्रयोग, मंच सज्जा और अभिनेताओं का जीवंत संवाद दर्शकों को मोहित कर आकर्षित करता था।
बच्चे कल नौजवान होंगे, अलखनन्दन की सबसे बड़ी देन बाल रंगमंच है। उन्होंने बच्चों के लिए अनेक नाटक लिखे और प्रस्तुत किए: जिनमें सलोनी गौरेया, जादू का सूट, नारद जी फँसे चकल्लस में, मूरख गुरु के मूरख चेले, अक्ल से सबकी करो भलाई, भेड़िया तंत्र, हम हवाएँ, हमारी पृथ्वी इत्यादि। आप बच्चों की रंग-प्रतिभा को विकसित करने के लिए कार्यशालाएँ आयोजित करते और उन्हें मंच पर लाने का साहसिक प्रयास करते थे।
अलखनन्दन जी ने बुंदेलखण्डी स्वांग जैसी लुप्तप्राय लोकनाट्य शैलियों को पुनर्जीवित किया। 1992-96 के बीच भारत सरकार की वरिष्ठ फेलोशिप उन्हें स्वांग पर शोध और उसके पुनराविष्कार के लिए प्रदान की गई। आप मानते थे कि लोक परंपराएँ भारतीय रंगमंच की आत्मा हैं और वर्तमान आधुनिक नाटक को लोक नाटकों से शक्ति लेनी चाहिए। अलखनन्दन जी  की रंग दृष्टि और रंग-चिन्तन में कुछ मुख्य सिद्धान्त महत्वपूर्ण हैं: 
नाटक को समाज की समस्याओं, वर्गीय-जातीय असमानताओं और मानवीय अन्याय पर विचार करना चाहिए। स्वांग, लोकगीत, लोकभाषा और कथावाचन शैली को आधुनिक नाटकों में समावेश कर दर्शकों के निकट लाना। पारंपरिक मंचन के साथ नयी तकनीक, दृश्य संरचना और कथावाचन की शैलियों का प्रयोग। बच्चों और युवाओं के लिए रंगमंच को शिक्षा और व्यक्तित्व निर्माण का साधन बनाना। आप मानते थे कि नाटक केवल भावनाओं का विस्फोट नहीं बल्कि एक सुसंगठित कला है जिसमें अभिनय, वेशभूषा, संगीत, प्रकाश और संवाद सभी घटक एक समग्र रूप देते हैं।

अलखनन्दन जी के रंगमंचीय योगदान के  अनेक राष्ट्रीय-राज्य स्तरीय सम्मान मिले जिनमें मध्यप्रदेश शासन का शिखर सम्मान (2006), मास्टर फिदा हुसैन नरसी सम्मान, श्रेष्ठ कला-आचार्य सम्मान, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (निर्देशन), लाइफ-टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड आदि।
अपने जीवन के अंतिम समय तक रंगमंच के प्रति सक्रिय रहे। अलखनन्दन जी हिन्दी रंगमंच के जनपक्षधर, प्रयोगशील और लोकाभिमुख रंगकर्मी थे। उन्होंने लेखक, निर्देशक, पत्रकार और सिद्धांतकार के रूप में भारतीय रंगमंच को गहराई दी।
उनके नाटकों में व्यंग्य, हास्य और लोकभाषा का प्रयोग है तो उनके निर्देशन में अनुशासन, लोकसंगीत और नवाचार की झलक है। आप मानते थे कि रंगमंच जीवन से अलग नहीं हो सकता। उनकी दृष्टि में नाटक एक सामाजिक संवाद और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का औजार है। उनके विचार और कार्य आज भी रंगकर्मियों के लिए मार्गदर्शक हैं।